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वीं शताब्दि) वैदिक विद्वान् कौत्स्य वेदोंकी असम्बंधता देखकर भौचकासा रह गया था और उसने वेदोको अनर्थकं बतलाया था (अनर्थका हि मंत्राः । यास्क, निरुक्त १५ – १) यास्कका ज्ञान भी वेदोके विषयमे उससे कुछ ज्यादा अच्छा नहीं था । (निरुक्त १६/२) फिर ईस्वी चौदहवीं शताब्दिमें आकर सायण भी ऋग्भाप्य में वैदिक मान्यता के अर्थको ठीकर नहीं पाता है । ( स्थाणुरयम् भारहारः किलामूर्वित्य वेदं न विज्ञानाति योऽर्थम् ।) इस दशामें यह कैसे कहा जाता है कि वेदोंमें ऋषभ नेमि, अर्हन् आदि जैनत्व द्योतक शब्दों का अर्थ जो आजकल किया जाता है वहां ठीक है ? स्वयं ब्राह्मण विद्वान ही उनको जैनत्व सूचक बतलाते हैं। उधर प्राचीन जैन विद्वान उनका उल्लेख जैनधर्मकी प्राचीनता के प्रमाण रूप में करते मिलते हैं । तिसपर स्वयं भाष्यकार सायण वैदिक अर्थको स्पष्ट करनेके लिये पुराणादिको प्रमाणभूत मानता है और पुराणादिमें ऋषभ, अर्हन् आदि शब्द स्पष्ट जैनत्व सूचक मिलते है । अतः वेदोंमें जैनोंका उल्लेख होना प्राकृत सुसंगत है ।
वेदोके बाद रामायण में भी जैन उल्लेख मौजूद है, जिससे स्पष्ट है कि 'रामायण काल' में भी जैन
रामायण कालमें जैनधर्म |
धर्म विद्यमान था । रामायणके बालकाण्ड ( सर्ग १४ लो० २२ ) के मध्य राजा दशरथका श्रमणोंको आहार देनेका उल्लेख
है । ("तापसा भुञ्जते चापि श्रमणा भुञ्जते तथा । ") श्रमण शव्दका अर्थ भूषण टीकामे दिगम्बर साधु किया गया है । ("श्रमणा दिगम्बराः श्रमणा वातवसनाः | ") भतएव यह श्रमण दिगम्बर जैन