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[२१] भी ऋग्वेद और यजुर्वेदमें आये हैं और यह नाम जैन तीर्थकरोंक हैं। प्रत्युत चौवीस तीर्थकरों और श्री महावीरजीके उल्लेख भी ऋग्वेद और यजुर्वेदमें बतलाये गये हैं * ऋग्वेदमें ऐसे 'श्रमणों का भी जिक्र है, जो यज्ञोमें होनेवाली हिसाका विरोध करते थे। यह श्रमण जैनोंके सिवाय और कोई नहीं होसक्ते; क्योंकि जैनधर्म स्पष्ट रीतिसे यज्ञोमें होनेवाली हिसाका विरोधक प्रारम्भसे रहा है. और वह श्रमण धर्म भी कहलाता है अन्यत्र प्रस्तुत पुस्तकमें हमने
१-हिस्टॉरोकल ग्लीनिनिंग्स पृ० ७६ । ... श्रीयुत प० अजितकुमारजी शास्त्रीने 'सत्यार्थ दर्पण में (पृ० ९१) ऋग्वेद आदिने निम्न उद्धरण दिये हैं, इनसे जैन तीर्थकरोंका व्यक्तित्व प्रमाणित है:- . -
."ॐ त्रैलोक्यप्रतिष्टितान् चतुर्विशतितीर्थकरान् ऋषभाया वर्द्धम:न्तान् सिद्धान् शरण प्रपद्ये । ॐ पवित्र नग्नमुपविप्रसामहे एषा नग्नों ग्निये) जातिर्येषां वीरा । येपा नग्मं सुनग्न ब्रह्म सुब्रह्मचारिण उदितेत
सा देवस्य महर्पयो महर्षिभिजहेति या जकस्य य जंतस्य च सा एषा | भवतु शातिर्भवतु, तुष्टिर्भवतु, गक्तिर्भवतु, स्वस्तिर्भवतु, श्रद्धाभवतु, जि भवतु ।' ( यज्ञेषु मूलमंत्र एप इति विधिकदल्या)। "जातारमिन्द्र ऋषमं वदन्ति अतिवारमिन्द्रं तमरिष्टनेमि । भवे भवे । सुपार्श्वमिन्द्र हवे तु शक्र अजित जिनेन्द्रं तद्वद्वर्द्धमान पुरुहूतमिन्द्र
॥ नम सुवीरं दिग्वासस ब्रह्मगर्भ सनातनम् । दयातु दीर्घायुस्त्वाय वर्चसे सुप्रजास्त्वाय रक्ष रक्ष रिटनेमि स्वाहा ।' (बृहदारण्यकें). 'आतिय्यरूपं मासर महावीरस्य नग्नहु । पामुपासादामेतत्तियौ रात्रौः मुगमुताः ॥' यजुर्वेद अ० १९ म० १४ पमिन्द्रस्य प्रमहसाऽने वन्दे नव श्रिय । भो गम्मवानसिममध्वरेष्विव्यसे ।" ऋग्वेद ४० ४ भ० ३ १.६.. ऋग्वेद ३-३-१४-२।।