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________________ १७६ श्रात्मतत्व-विचार था । इसलिए वे आत्मज्ञान से वचित रहे । जब उन्हे महावीर प्रभु जैसे सद्गुरु मिले और जब उन्होने उनकी शकाओ का निवारण कर दिया; तभी वे आत्मज्ञान पा सके । गुरु दीपक हैं गुरु दीपक हैं । वे आपके हृदय के मिध्यात्वरूपी अधकार को दूर कर सकते हैं और सन्मार्ग-दर्शन करा सकते हैं। वे आपके पथ-प्रदर्शक बनकर सकुशल पार पहुॅचा देते है । जैसे, पारस से लोहा सोना बन जाता है; वैसे ही सद्गुरु के सग से नास्तिक भी आस्तिक बन जाता है और ससार से विरक्त होकर सयम के मार्ग पर चलने लगता है । उसने अपने पुत्र को चेतावनी पास न जाना । शायद जाना भी ।" रोहणिया का बाप महावीर की रोहणिया उनके उपदेश को सुनेगा और शायद ससार का त्याग करके रोहणिया का पिता पक्का चोर था । दी- " तू सब करना, पर महावीर के पडे तो उनके उपदेश पर कान न देना शक्ति जानता था । उसे डर था कि तो इस चोरी के धंधे को छोड ढेगा, साधु भी हो जाये ।” लड़के गुरु के पास जायेंगे तो - ढाई हजार वर्ष पहले यह बात चोर कहते थे । यही बात आज साहूकार कहने लगे है | उन्हें डर है कि, लड़के गुरु के पास जायेगे तो धर्ममार्ग पर लग जायेंगे और ससारी से साधु हो जायेंगे । इसलिए, वे उन्हे अनार्यों की संगति करने देते हैं, चाहे जिसके साथ भटकने देते हैं और निस्सार शिक्षण दिलाने मे आनन्द मानते हैं। फिर इन लड़को का कल्याण किस तरह होगा ? प्राचीनकाल मे क्षीरकदम्ब उपाध्याय अपने तीन शिष्यों के साथ रात मे आकाशी पर सोये हुए थे। उस वक्त वहाँ से निकले । उनमें से एक ने दूसरे से कहा--" इन तीन दो चारण मुनि शिष्यों मे से एक
SR No.010156
Book TitleAtmatattva Vichar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLakshmansuri
PublisherAtma Kamal Labdhisuri Gyanmandir
Publication Year1963
Total Pages819
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size26 MB
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