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________________ तृतीय अध्याय किया है और उन्हें रीतिकालीन शृङ्गार चेतना के उदगम' के रूप में उपस्थित किया है। आपको छोहल की चार रचनामों-प्रात्म प्रतिबोध जयमाल. पंच सहेली, छीहल बावनी और पंथी गीत का पता चला है। आपने लिखा है कि पन्थी गीत और आत्म प्रतिबोध जायमाल में कवि का नाम छीहल ही दिया हुआ है, किन्तु पन्थी गीत अत्यन्त साधारण कोटि की रचना है, जिसमें जैन कथानों के सहारे कुछ उपदेश दिए गए हैं। प्रात्म प्रतिबोध जयमाल भी नाम से कोई जैन धार्मिक ग्रथ ही प्रतीत होता है। गेप दो रचनाओं में शृङ्गार और नीति की प्रधानता है। इन रचनाओं के अतिरिक्त उनकी तीन और छोटी रचनाए रे मन गीत', 'उदर गीत' और 'जग सपना गीत' प्राप्त हैं। छीहल ने स०१५७५ में पंच महेली' की रचना की थी। इसके नौ वर्ष बाद सं० १५८४ के कार्तिक मास, गुक्ल पक्ष अष्टमी गुरुवार को बावनी की रचना सम्पन्न की। इसके अन्तिम छापत्र में उन्होंने अपना परिचय दिया है, जिससे पता चलता है कि आप अग्रवाल वश में नलिगांव' नामक स्थान में पैदा हुए थे। आपके पिता का नाम मिनाथ या शिवनाथ' था : चउरासी आगल्ल सइ जु पन्द्रह सम्वच्छर। सुकुल पक्ख अष्टमी मास कातिक गुरुवासर।। हिरदय उपनी बुद्धि नाम श्री गुरु को लीन्हो । सारद तनइ पसाइ कवित सम्पूरण कीन्हो । नालि गांव सिनाथु सुतनु अगरवाल कुल प्रगट रवि ।। बावनी वसुधा विस्तरी कवि कंकण छीहल कवि। इसके अधिक आपके सम्बन्ध में कोई विवरण प्राप्त नहीं होता। 'पात्म प्रतिबोध जयमाल' की एक हस्तलिखित प्रति मझे जयपुर के दिगम्बर जैन मन्दिर बड़ा तेरह पंथियों के शास्त्र भांडार से प्राप्त हुई है। यह प्रति गुटका नं० ३२०, पत्र सं० ३८-३९ पर सुरक्षित है। यह कोई बड़ा ग्रन्थ नहीं है, ३३ छन्दों की छोटी रचना है। रचना के आरम्भ में 'अथ आत्म प्रतिवोध जयमाल लिख्यते ।' लिखा हुआ है और अन्त में "इति आत्म संवोधन जयमाल समाप्तः।" दिया हुआ है। दोनों का तात्पर्य एक हो है। इसमें आत्मा का संबोधन या प्रतिबोधन है। इसी गुटके के पत्र ४५ पर 'आत्म संबोधन जयमाल' के दो घत्ते और पाँच चौपाइयाँ और लिपिबद्ध हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि लिपिकार से पहले यह अंश छुट गया था, अतएव बाद में उसे जोड़ दिया। १. डा० शिव प्रसाद सिंह-सूर पूर्व ब्रजभाषा और उसका साहित्य - पृष्ठ १६८। २ सम्बन पनरह पचुहत्तरइ पूनिम फागुन मास । पंच सहेली बरनव', कवि छोहल परगास ।। ६८।। ३. सूर पूर्व ब्रजभाषा और उसका साहित्य, पृ० १६६ से उद्धृत ।
SR No.010154
Book TitleApbhramsa aur Hindia me Jain Rahasyavada
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVasudev Sinh
PublisherSamkalin Prakashan Varanasi
Publication Year
Total Pages329
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size60 MB
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