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________________ अपभ्रंश और हिन्दी में जैन-रहस्यवाद और स्नेहियों से भी मन विरक्त हो गया है। रात दिवस एक ही कामना हैप्रिय से मिलन कैसे हो ? अन्न वस्त्र भी छोड़ दिया है। प्रिय मिलन से ही उसका 'सुहाग' पूर्ण होता है। आत्मा प्रेम के रंग में मस्त हो उठता है। वह अपना पूर्ण शृङ्गार करता है। वह भक्ति की मेंहदी और भाव का अंजन लगाता है, सहज स्वभाव की चूड़ी, स्थिरता का कंकण धारण करता है। सुरति का सिन्दर शोभित होता है. अजपा की अनहद ध्वनि उत्पन्न होती है और तब अविरल आनन्द की झड़ी लग जाती है। जिसको इस स्थिति की अनुभूति हो जाती है, वह साम्प्रदायिक भेद के पचड़े में नहीं पड़ता। उसके लिए राम और रहीम, केशव और करीम में कोई अन्तर नहीं दिखाई पड़ता। पार्श्वनाथ और ब्रह्मा उसके लिए समान हो जाते हैं। इसीलिए आनन्दघन कहते हैं कि राम कहो या रहीम, कृष्ण कहो या महादेव, पार्श्वनाथ कहो या ब्रह्मा, परमात्मा एक है, अखण्ड है। जिस प्रकार एक मृतिका पिण्ड से नाना प्रकार के पात्र बनते हैं तथा मृत्तिका की अवस्थिति सर्वत्र रहती है, उसी प्रकार हम अखण्ड ब्रह्म में अनेक प्रकार के खण्डों की कल्पना कर लेते हैं। वस्तुत: राम वह है जो सर्वत्र रमण कर रहा है, रहीम वह है जो दया करता है, कृष्ण वह है जो कर्मों का कर्पण करता है, महादेव वह है जो निर्वाण प्राप्त कर चुका है, पार्श्वनाथ वह है जो रूप का स्पर्श करता है, ब्रह्मा वह है जो ब्रह्म को पहचान जाता है । यही चरम सत्य है। इसी की जानकारी प्रत्येक साधक का लक्ष्य है। इस लक्ष्य की प्राप्ति हेतु साधक को बाह्य उपकरण के अवलम्ब की आवश्यकता नहीं पड़ती। इड़ा-पिंगला के मार्ग का परित्याग कर सुषमना घर वासी' होना पड़ता है, ब्रह्मरंध्र के मध्य 'श्वासपूर्ण' होने पर 'अनहद नाद' सुनाई पड़ने लगता है और साधक ब्रह्मानुभूति का माक्षात्कार करने की स्थिति में हो जाता है। आनन्दघन 'अवधू' को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि 'तू तन मठ में क्या सो रहा है, जगकर घट में क्यों नहीं देखता ? उसी में 'ब्रह्म' का वास है, जिसे तू बाहर खोजता रहा। नश्वर शरीर १. प्यारे श्राप मिलो कहा अंतै जात, मेरो विरह व्यथा अकुलात गात । एक पैसा भर न भावै नाज, न भूषण नहीं पट समाज । (पद ५८, पृ० ३८३) २. देखिए - अाज नुहागन नारी, अवधू आज० (पद २०, पृ० ३६५) ३. राम कहो रहमान कही कोउ, कान कहो महादेव री। पारसनाथ कहा कोउ ब्रह्मा, सकल ब्रह्म स्वमेव री। भाजन भेद कहावत नाना, एक मृत्तिका रूप री। तैसे खण्ड कल्पना रोपित, श्रार अखण्ड सरूप री। निज पद रमे राम सो कहिए, रहिम करे रहेमान री। करसे करम कान सो कहिए, महादेव निर्वाण री। परसे रूप पारस सो कहिए, ब्रह्म चिन्हे सो ब्रह्म री। इह विध साघो अप आनन्दघन चेतनमय निःकर्म री ।। (घनानन्द और आनन्दघन, पद ६७, पृ० ३८८)
SR No.010154
Book TitleApbhramsa aur Hindia me Jain Rahasyavada
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVasudev Sinh
PublisherSamkalin Prakashan Varanasi
Publication Year
Total Pages329
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size60 MB
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