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________________ ( २० ) विशेष किये, तब पृथ्वीकायादिकरूप जीव के मनुष्य जीव है, नारको जीव है । इत्यादि प्रकार सहित उन्हे जीव की पहचान हुई । इस प्रकार व्यवहार बिना ( शरीर के सयोग बिना) निश्चय के ( आत्मा के ) उपदेश का न होना जानना । प्रश्न २६ - प्रश्न २५ मे व्यवहारनय से शरीरादिक सहित जीव की पहचान कराई तब ऐसे व्यवहारनय को कैसे अंगीकार नही करना चाहिए ? सो समझाइए । उत्तर - व्यवहारनय से नर-नारक आदि पर्याय ही को जीव कहा सो पर्याय ही को जीव नही मान लेना । वर्तमान पर्याय तो जीवपुद्गल के सयोगरूप है । वहा निश्चय से जीव द्रव्य भिन्न है - उस ही को जीव मानना । जीव के सयोग से शरीरादिक को भी उपचार से जीव कहा सो कथनमात्र ही है । परमार्थ से शरीरादिक जीव होते नही. ऐसा ही श्रद्धान करना । इस प्रकार व्यवहारनय ( शरीरादि वाला जीव) अगीकार करने योग्य नही है । प्रश्न २७ - व्यवहार बिना (भेद बिना) आत्मा का ) उपदेश कैसे नही होता ? समझाइये | निश्चय का ( अभेद इस दूसरे प्रकार को उत्तर-निश्चय से आत्मा अभेद वस्तु है । उसे जो नही पहचानते उनसे इसी प्रकार कहते रहे तो वे कुछ समझ नही पाये । तब उनको अभेद वस्तु मे भेद उत्पन्न करके ज्ञान दर्शनादि गुण-पर्यायरूप जीव के विशेष किये। तब जानने वाला जीव है, देखने वाला जीव है । इत्यादि प्रकार सहित जीव की पहचान हुई । इस प्रकार भेद बिना अभेद के उपदेश का न होना जानना । प्रश्न २८ - प्रश्न २७ मे व्यवहारनय से ज्ञान दर्शन भेद द्वारा जीव की पहचान कराई । तब ऐसे भेदरूप व्यवहारनय को कैसे अगीकार नहीं करना चाहिये ? सो समझाइये | उत्तर- अभेद आत्मा मे ज्ञान - दर्शनादि भेद किये सो उन्हे भेद J
SR No.010121
Book TitleJain Siddhant Pravesh Ratnamala 06
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDigambar Jain Mumukshu Mandal Dehradun
PublisherDigambar Jain Mumukshu Mandal
Publication Year
Total Pages317
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size11 MB
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