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________________ श्री सुमति तीर्थंकर स्तुति ५ १ भावार्थ - यदि सर्वथा सत्रूप या नित्यरूप माना जावे तो जैसे पुरुष व श्रात्मा की उत्पत्ति नहीं होती है वैसे किसी घट पट आदि कार्य की भी उत्पत्ति न बने । नित्यं पक्ष का एकान्त मनन से प्रवस्था की पलटने की व्यवस्था बन ही नहीं सकती । और मंदि सर्वथा वस्तु सत् सानी जावे अर्थात् क्षणिक थी सो नाश होगई ऐसा माना जावे तो भी कोई कार्य नहीं होगा । जैसे प्राकाश से फूल नहीं होते वैसे घट पट श्रादि काम न बनेंगे, म यह नियम ही रहेगा कि उपादान काररण के समान कार्य होता है अर्थात् जैसी मिट्टी होगी जैसे उसके बर्तन लेंगे । सुवर्ण जैसा होगा वैसा कड़ा बनेगा और जब वस्तु क्षणिक मानी जायगी तब यह निश्चय भी नहीं बन सकेगा कि इससे अमुक कार्य हो सकेगा । जब यह निश्चय ही न होगा कि गेहूं से रोटी बन सकेगी तो कौल गेहूं को खरीदेगा । इसलिये वस्तु न तो सर्वथा नित्य है, न सर्वथा क्षणिक या असत् है । वस्तु नित्य नित्य रूप है । सामान्य द्रव्य रूप से कोई वस्तु न उपजती न विनशती है क्योंकि द्रव्य सदा बना रहता है, वह अपनी अनन्त पर्यायों में टिका रहता है । विशेष पर्याय रूप से हो द्रव्य में उत्पाद व्यय होता है । इसलिये यह सिद्ध है कि जो सत् द्रव्य है वह एक ही काल उत्पाद व्यय धन्य स्वरूप है । पिछली पर्याय का नाश, वर्तमान पर्याय का जन्म सदा ही द्रव्य में होता रहता है । तथापि द्रव्य बना रहता है । यही वस्तु का सच्चा स्वरूप है। शुद्ध द्रव्यों मैं स व स्वाभाविक पर्यायें होती हैं, यशुद्ध द्रव्यों में विसदृश व औपाधिक पर्यायें होती हैं। द्रव्य पर्याय बिना नहीं, पर्याय द्रव्य बिना नहीं हो सकती है । यही वस्तु स्वभाव है । नोटक छन्द | जो नित ही हो तो नाश उदय, नहि हो न क्रिया कारक न सघय सत् नाश न हो नहि जन्म श्रसत्, जु प्रकाश गए पुद्गल तम सत् ।। २४|| उत्थानिका -अब प्राचार्य स्पष्टपने कहते हैं कि जीव प्रजीवादि पदार्थ सब नित्य नित्य श्रादि रूप से अनेक रूप हैं--- विधिनिषेधश्च कथंचिदिष्टौ विवक्षया मुख्यगुरुध्यवस्था | इति प्ररणीतिः सुमतेस्तवेयं मतिप्रवेकः स्तुववतोsस्तु नाथ ॥ २५ ॥ अन्वयार्थ – [ विधिनिषेधश्च ] विधि अर्थात् ग्रस्तिपना, भावपना या नित्यपना तथा निषेध अर्थात् नास्तिपना, प्रभावपना या श्रनित्यपना जीवादि पदार्थों के भीतर [कथंचित्] भिन्न २ अपेक्षात्रों से, द्रव्यार्थिक पर्यायार्थिक नयों से [ इष्टौ ] मान्य है, इष्ट है, सिद्ध है । द्रव्य की अपेक्षा वस्तु सत् या नित्य है, पर्याय की अपेक्षा वस्तु प्रसत् या
SR No.010072
Book TitleParmatma Prakash evam Bruhad Swayambhu Stotra
Original Sutra AuthorYogindudev, Samantbhadracharya
AuthorVidyakumar Sethi, Yatindrakumar Jain
PublisherDigambar Jain Samaj
Publication Year
Total Pages525
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size29 MB
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