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________________ - हाँ ! हाँ !! ठीक तो है, आर्थिक, राजनीतिक.... पर धीमे न पड़ो, चले चलो । — धीमे ! लेकिन, आपका रास्ता ही गलत हो तो ! - सही होनेकी श्रद्धा नहीं है तो अवश्य दूसरा रास्ता देख लो । मैं जा रहा हूँ । जवाहरलाल समझने-बुझनेको ठहर गया । गाँधी अपनी राह कुछ आगे बढ़ गया । जवाहरलालने चिल्लाकर कहा - लेकिन सुनो ! अरे जरा सुनो तो !! तुम्हारा रास्ता गलत है । मुझे थोड़ा थोड़ा सही रास्ता दीखने लगा है । गाँधी ने कहा- हाँ होगा, लेकिन जवाहर, मुझे लम्बी राह तय करनी है । तुम मुझे बहुत याद रहोगे । जवाहरलालको एक गुरु मिला था, एक साथी । वह कितना जवाहरलालके मनमें बस गया था ! उसका प्यार जवाहरलालके मनमें ऐसा ज़िन्दा है कि खुद उसकी जान भी उतनी नहीं है । उसका साथ अब छूट गया है। — लेकिन, राह तो वह नहीं है, दूसरी है, यह बात भी उसके मनके भीतर बोल रही है । वह ऐसे बोल रही है जैसे बुखार में नब्ज़ । वह करे तो क्या करे ! 'इतनेमें पीछेसे काँग्रेसकी भीड़ आ गई । पूछा – जवाहर, क्या बात है ! हाँफ क्यों रहे हो ? रुक क्यों गये ? जवाहरलालने कहा— रास्ता यह नहीं है । भीड़के एक भागने कहा --- लेकिन, गाँधी तो वह जा रहा है ! जवाहरलालने कहा- हाँ, जा रहा है। गाँधी महान् है । लेकिन, रास्ता यह नही है। पॉलिटिक्स और कहती है। ११४
SR No.010066
Book TitleJainendra ke Vichar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPrabhakar Machve
PublisherHindi Granthratna Karyalaya
Publication Year1937
Total Pages204
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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