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________________ ( ११४ ) रूपसे ध्यान करना । नौ वार णमोकार मंत्र कहने या २७ श्वासोच्छ्रास में जो समय लगे वह एक कायोत्सर्ग का काल है। ६. तप - एक व अनेक उपवास आदि ग्रहण करना । ७. छेद - मुनि दीक्षा का समय घटा देना । ८. परिहार --मुनि संघसे कुछ काल के लिए अलग करना । ६. उपस्थापन -- फिर से दीक्षा देकर शुद्ध करना । २] विनय - - भीतर से बडा श्रादर रखना । यह चार तरह का है १. ज्ञानविनय -- बड़े भाव से ज्ञान को बढ़ाना । २. दर्शन विनय -- बड़ी भक्ति से सच्चे तत्वों में श्रद्धा स्थिर रखना । ३. चारित्र विनय -- बड़े श्रादर से साधु का था श्रावक का चारित्र पालना । — ४. उपचार विनय - देव, गुरु, शास्त्र आदि पूजनीय पदार्थों का मुखसे स्तवन व काय से नमन श्रादि करना । [३] वैय्याहृत्य -- बिना किसी स्वार्थकै सेवा करना । निम्न दश प्रकार के साधुओं की सेवा सदा करनी चाहिये१. श्राचार्य २ उपाध्याय ३. तपस्वी ४. शैक्ष्य-नवीन शिष्य मुनि ५ ग्लान- रोगी ६० गण - एक विशेष संघ ७. कुलएक ही गुरु के शिष्य ८ संघ-मुनि समूह ६. साधु-बहुत कालके साधक. १०. मनोश-सुन्दर विद्वान सुप्रसिद्ध साधु । [ ४ ] स्वाध्याय शास्त्रोंका मनन- यह पांच तरहसे होता है। १ बाँचना-पढना सुनना २ पृच्छना - शङ्काको साफ़
SR No.010045
Book TitleJain Dharm Prakash
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShitalprasad
PublisherParishad Publishing House Bijnaur
Publication Year1929
Total Pages279
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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