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________________ ( १०८ ) भाव रखना कि संसार में मेरा मेरे आत्मा के सिवाय कोई परमाणु मात्र भी नहीं है । Trenche [१०] उत्तम ब्रह्मचर्य - सर्व कार्मोके भावोंको त्याग कर अपने ब्रह्म स्वरूप श्रात्मामें लीन होना व स्वस्त्री व परस्त्री का त्याग करना । इन दश धर्मों को साधु जन भले प्रकार पालते हैं ४८. बारह भावना जिन को वराबर चिन्तवन किया जावे उनको भावना कहते हैं, वे बारह तरह की हैं। [१] अनित्य- इस जगत में घर, पैसा, राज्य, स्त्री, पुत्र, मित्र, कुटुम्ब सव ही नाशवन्त हैं, इनसे मोह न करना । [२] शरण- जब पाप का तीव्र फल होता है या मरण श्राता है तो कोई मन्त्र, यन्त्र, वैद्य, रक्षक बच्चा नहीं सकते । [३] संसार-चार गति रूप संसार में प्राणी इन्द्रिय विषयों की तृष्णा में फंसा हुआ रोग, शांक, वियोग के अपार कष्टों को भोगता हुआ सुख शान्ति नही पाता है । [४] एकत्व - इस मेरे जीव को अकेला ही जन्मना मरना व दुःख भोगना पड़ता है, मेरा श्रात्मा सब से निराला एक श्रानन्द मई अमूर्तीक है । [५] श्रन्यत्व मेरे श्रात्मा से शरीरादि व सर्व ही अन्य आत्मायें व अन्य पांचों द्रव्य बिलकुल भिन्न हैं । उत्तम क्षमा मार्दवार्जव सत्य शौच संयम तपस्त्यागाकिंचन्य ब्रह्मचर्याणि धर्मः ॥ ६ ॥ ( तत्वा० श्र० ६ )
SR No.010045
Book TitleJain Dharm Prakash
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShitalprasad
PublisherParishad Publishing House Bijnaur
Publication Year1929
Total Pages279
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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