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________________ 8 मिथ्यात्व. [५०६ पाँचों आपस में लड़ने लगे । प्रत्येक अंधा अपने को सच्चा और दूसरों को झूठा कहने लगा । अंधों को इस तरह झगड़ते देख कर एक सूझते आदमी ने कहा-तुम एक-एक जैसा कह रहे हो वैसा ही मान लिया जाय तो तुम सभी झूठे ठहरते हो । अगर तुम पाँचों के कथन का समन्वय कर लिया जाय तो सभी सच्चे हो सकते हो । जो खंभे के समान कहता है उसने सिर्फ पाँव छुआ है । जो अंगरखे की बाँह के समान कहता है उसने सिर्फ सँड का स्पर्श किया है । जो सूप के जैसा कहता है उसने सिर्फ कान पर हाथ फेरा है और जो झाड़ के समान बतलाता है उसने पूँछ को छुआ है । जो चबूतरा जैसा कहता है, उसने पीठ को हाथ लगाया है। पूरा हाथी तुम में से किसी ने नहीं जाना। तुम पाँचों के मत को एकत्र किया जाय तो हाथी का पूरा आकार बनता है । इस प्रकार तुम दूसरों को झूठा कहते हो, इसी से तुम झठे हो और यदि सब सब को झूठा न कह कर सच्चा मानो तो सभी सच्चे ठहरोगे। इसी प्रकार अपने-अपने मत की स्थापना और दूसरे के मत का निषेध करने वाले एकान्तवादी मिथ्यात्वी कहलाते हैं । इन पाँचों एकान्तों के संयोग से ३६३ मिथ्या मत होते हैं। वे इस प्रकार हैं:-मूलतः पाखंडी मत चार प्रकार के हैं-(१) क्रियावादी (२) अक्रियावादी (३) अज्ञानवादी और (४) विनयवादी। इनमें से क्रियावादी के १८० भेद हैं । काल, स्वभाव, नियति कर्म और उद्यम, इन पाँचों को स्व-आत्मा और पर-आत्मा के साथ लगाने से दस भेद हुए । इन दस बोलों पर शाश्वत (नित्य) और अशाश्वत (अनित्य) विकल्पों का योग करने पर बीस भेद हुए। इन बोलों को नौ तत्वों पर लागू करने से १८० भेद क्रियावादी के होते हैं। [१] क्रियावादी का मत यह है कि जीव को पाप-पुण्य रूप क्रिया लगती रहती है। इस क्रिया के निमित्त से ही जीव इहलोक और परलोक को स्वीकार करता है। क्रियावादी एक मात्र क्रिया (चरित्र) की ही उपयोगिता स्वीकार करता है । वह ज्ञान और दर्शन की उत्थापना करता है। वह यह नहीं सोचता कि ज्ञान के बिना क्रिया का ठीक-ठीक स्वरूप किस
SR No.010014
Book TitleJain Tattva Prakash
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherAmol Jain Gyanalaya
Publication Year1954
Total Pages887
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size96 MB
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