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जिनप्रतिमा मानने और पूजने की चर्चा सब कार्यों में प्राणीवध भी होता है। यदि मात्र प्राणीवध को हिंसा मानोगे, तो साधु-साध्वी का पाँच महाव्रतों को पालन करना सर्वथा हिंसा का कारण प्रमाद है -
शरीरी म्रियतां मा वा, ध्रुवं हिंसा प्रमादिनः ।
सप्राणव्यपरोपेऽपि, प्रमादरहितस्य न ।। अर्थात् शरीरधारी प्राणी मरे अथवा न मरे पर प्रमादी को निश्चय ही हिंसा होती है। यदि प्राणी का नाश कदाचित् प्रमादरहित (अप्रमादी) व्यक्ति से हो भी जावे तो उसे हिंसा का दोष नहीं लगता।
३- विशेष खुलासा - यदि कोई व्यक्ति प्रमाद (कषाय अथवा लापरवाही और उपयोगरहित) गमनागमन करे अथवा कोई अन्य काम करे तो उससे जीव चाहे मरे अथवा न मरे तो भी हिंसा लगती है। यदि अप्रमाद (जयणा तथा सावधानी) से कार्य अथवा गमनागमन करता है तो कदाचित् उससे जीववध हो भी जावे तो भी उसे भावहिंसा का दोष नहीं लगता ।
दृष्टान्त - नदी में उतरनेवाले साधु-साध्वी को जयणापूर्वक पानी में उतरने पर भी अपकाय के जीवों की विराधना भावहिंसा का कारण नहीं। पानी के एक बंद में असंख्यात जीव होते हैं। यदि सेवालवाला पानी हो तो उसमें अनन्त जीवों का विनाश भी होता है। यदि नदी में उतरनेवाला मुनि प्रमादी हो तो उसे भावहिंसा का दोष लगता है, अप्रमादी को नहीं लगता । __ श्रीभगवतीसूत्र में कहा है कि केवलज्ञानी के गमनागमन से तथा उनके नेत्रों के चलनादि से बहुत जीवों का घात होता है, परन्तु उन्हें मात्र काययोग द्वारा ही इरियापथिक बन्ध होता है। ऐसा होने से वे प्रथम समय में बाँधते हैं, दूसरे समय में वेदते (भोगते) हैं और तीसरे समय में निर्जरा कर देते हैं।
इसी प्रकार जिनप्रतिमा की पूजा आदि में हृदय में दयाभाव तथा प्रभुभक्ति होने से यदि किसी सूक्ष्म जीवजन्तु का प्राणवध हो भी जाए तो उसे हिंसा का दोष नहीं लगता । परन्तु कषायरहित अप्रमत्त शुद्धभावों से प्रभु की भक्ति से महान उत्तम फल की प्राप्ति होती है। यहाँ तक कि सर्वथा कर्मक्षय होकर मोक्षप्राप्ति भी संभव है।
श्रीआचारांगसूत्र में कहा है कि"पमत्तस्स सव्वओ भयं अपमत्तस्स वि न कुतो वि भयमिति ।। अर्थात् प्रमादी को सब भय हैं, परन्तु अप्रमादी को कहीं भी भय नहीं है।
Shrenik/DIA-SHILCHANDRASURI / Hindi Book (07-10-2013)/(1st-11-10-2013) (2nd-22-10-2013) p6.5
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