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सद्धर्मसंरक्षक १२. वि० सं० १९१५ में एक श्रावक ने संवेगी दीक्षा ली। नाम
भावविजयजी रखा। x १३. वि० सं० १९२३ में एक ने संवेगी दीक्षा ली। नाम विवेक
विजयजी रखा । बाद में दीक्षा छोडकर यति हो गया। यति
होने पर इसने अपना नाम भगवानविजय रख लिया। १४. वि० सं० १९२४ में एक श्रावक ने संवेगी दीक्षा ली । नाम
रतनविजय रखा। १५. वि० सं० १९२४ में दो स्थानकमार्गी साधुओं ने संवेगी
दीक्षा ली । ये दोनों आपस में गुरु-शिष्य थे । गुरु को आपने अपना शिष्य बना कर नाम मोहनविजय रखा । इसके शिष्य को भी संवेगी दीक्षा देकर मोहनविजय का
शिष्य बनाया । नाम चन्दनविजय रखा । १६-१७-१८. वि० सं० १९२२ में गुजरात में तीन श्रावकों
को आपके नाम की दीक्षा देकर उन तीनों के नाम क्रमशः
मोतीविजय, भक्तिविजय तथा दर्शनविजय रखे गये । १९. आपके एक शिष्य आनन्दविजयजी नाम के भी थे। यह
श्रीविजयानन्दसूरि (आत्मारामजी) से भिन्न थे । यह प्रायः
राधनपुर (गुजरात) में रहे। २०. मालेरकोटला (पंजाब) के अग्रवाल बनिये खरायतीमल ने
वि० सं० १९३१ में स्थानकवासी दीक्षा छोडकर अहमदाबाद
में संवेगी दीक्षा ली । नाम खांतिविजयजी रखा। २१. वि० सं० १९३२ में स्थानकवासी दीक्षा का त्याग कर १५
स्थानकवासी शिष्य-प्रशिष्यों के साथ अहमदाबाद में ऋषि
Shrenik/DIA-SHILCHANDRASURI / Hindi Book (07-10-2013)/(1st-11-10-2013)(2nd-22-10-2013) p6.5
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