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सद्धर्मसंरक्षक देहांत हो गया । कर्मोदेवी दलसिंह को साथ लेकर दूसरे गाँव में जाकर रहने लगी । उस गाव का नाम था बडा-कोटसाबरवान । इस गाँव के लोग बालक को बूटासिंह के नाम से पुकारने लगे । 'बूटा' का अर्थ है 'हरा-भरा वृक्ष' और 'सिंह' का अर्थ है 'श्रेष्ठ' । अर्थात् ऐसा श्रेष्ठ वृक्ष जो संसार में संतप्त भटकते प्राणियों को अपनी छत्र-छाया में रख कर सद्धर्म रूपी मीठे फलों का आस्वादन करावेगा । इस प्रकार इस बालक के तीन नाम हुए - १-टलसिंह, २-दलसिंह, ३-बूटासिंह । विद्याभ्यास तथा आत्मजाग्रति ___ गाँव में पाठशाला तो थी नहीं । बूटासिंह अपनी माता के साथ प्रतिदिन गुरुद्वारे (सिक्खों का धर्म स्थान-मंदिर) में जाने लगा और गुरुग्रंथसाहब (सिक्खों के प्रथम गुरु नानकसाहब की धर्मवाणी के संकलन रूप ग्रंथ) के ग्रंथी (धर्मप्रवचनकर्ता) द्वारा धर्मोपदेश सुनने लगा । दोपहर को गुरुद्वारा में जाकर गुरुमुखी (सिक्खों की धर्मलिपि तथा भाषा) का अभ्यास करने लगा। धीरे धीरे गुरुमुखी भाषा को पढने-लिखने का प्रौढ विद्वान बन गया । सिक्खों के धर्मग्रंथों (ग्रंथसाहब, मुखमणी, जपजी आदि) का अभ्यास करने लगा । साधु-संतों की संगत में अधिक समय बिताने लगा । धर्मग्रंथों के अभ्यास से, नित्यप्रति गुरुवाणी के श्रवण-मनन और चिन्तन से धीरे-धीरे उसे संसार से वैराग्य होने लगा। बालक की आयु जब पंद्रह-सोलह वर्ष की हो गई, तो एक दिन उसने अपनी माताजी से सविनय निवेदन किया -"माताजी ! मेरे पूर्वपुण्य के प्रताप से मेरी रुचि सांसारिक सुख-भोगों की ओर बिलकुल नहीं है। मेरे भाव वैराग्य की तरफ पूर्णरूप से दृढ बन चुके हैं। मेरी
Shrenik/DIA-SHILCHANDRASURI / Hindi Book (07-10-2013) 1(1st-11-10-2013) (2nd-22-10-2013) p6.5