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________________ अंक ३] नौ कला नांम तेहनुं नाम कमलविजय ५ ए पांच पिता सहित पुल ते । पुनः सा श्रीवतनो बनेवी सं० सादूल वृद्ध छै, माटि रु० सादूल नांम दीवो ६ त स्य पुत्र स० भक्ति तेहनो नाम भक्तिविजय १, सा० श्री वेतनी (१०८-२) बहिन रंगादे तेहनो नाम रंगश्री दीधो ८, सा० श्रीवंतनी पत्नी सिणगारदे तेहनो नांम लाभश्री दीधो ९, सा० श्रीवतनी पूत्रां सहिजो तेहनो नाम सहीज श्री दीधो १० । एवं दश संबंधी साथी च्यारसे अनि सत्तावन मण वृति ज्ञाति, गोत्रि, मित्र, साधर्मिक प्रमुख सप्तक्षेत्र पंच जीर्णोद्धार इत्यादि सुकृति करीने श्रीहीरें स्व नेश्राई श्री सिरोही नगरई श्री रुषभ चैत्ये सं० १६५१ वर्ष व्रत, पहिला कह्या ए नाम दीधा । ते मांहि लघु कमलविजयने श्री गुरुए समतादिक गुणि योग्य जांणी उ० श्री सोमविजय ग० ने वाचनाई भलाव्या | अनुकमि पुन्योदयि षट् शास्त्रमा ज्ञाता हुया | तिवारे श्री विजयसेन सूरीई अणहिल पत्तनई श्री पंचासर पास प्रासादे कमलविजयनें पं० पदि कीधा | वि० सं० १६७५ वर्षे श्रोसिरोही नगरई गछ नायक पद हुआ। प्रा० १० पोलिट्या गौत्र वीरपाल सुत सं० आंवा भाइ सं० मेहाजाल पद महोत्सव की | सकल सहिर पुनः साधर्मिक संतोषी मनुष्य मनुष्य पीर जी एक एक दीवी । श्री सूरीने उपदेशि रंजित था श्री सिद्धाचल १ ( १०९-१ ) गिरीनार २, तारणगीरी ३, अनूदगीरी ४, घोघा नव खंड पास ५, शंखेश्वर पास ७, बंभणवाड ६, एवं सप्त तीर्थनो संघाधिपति हुआ । ते संवनो वर्णन कवितः -- सं० । are वंशावलि. ५७ प्रमुखि एकसठ प्रासादि जीर्णोद्धार कीधो । वि० सं० १६८२ वर्षे श्री शांतीलपुर नगरें श्री संवाग्रही विजयदेव सूरीने श्री विजयानंद सूरीनें गछ मेल हुओ । पुनः सं० १६८५ वर्षे अणहिल्लपटनि श्री विजयानंद सूरी थकी कपट करीने श्री विजयदेव सूरी गछ भेद करी सागरने गछ माहि लेने देवसूरी जुदा हुया | २ गछ हुया अणहिल पत्तनि । श्री विजयानंद सूरीये संखेडई नगर श्री आसापुरी प्रासाद दत्त वर थकि सं० १६९९ वर्षे पंचांगुलीनो उपद्रव देवसूरी कीधो । ते श्री सूरीई आसपुरी देव्याई उपद्रव टाल्यो | जय हुआ । श्री गुरु गछि मंगल श्रेणि हुइ | केतलेक दिने मुगसी पासनी यात्रा कीधी । श्री गुरुने अंतरीक पासनी यात्रानो हर्ष हूओ । केतलेक वर्षे दक्षिणे बहरानिपुर नगरे बोमासई रह्या । खानदेशी कुंकणे विचरतां सूरति चोमासी रह्या अनुकमि कान्हर्मि विचरता खभायति तत् शाषा श्री अक्कबरपुर नगरे श्री सूरी संघाग्रही चउमासि रह्या । तिहां श्रीमालि वृ० शाषाई परिष वजीयाना आग्रह थकी श्री विजयराज सूरीने भट्टारकपद दीवा । पा० बजीयायें पदोत्सव कीधो । श्री गुरुनी आशा लही श्री विजयराज सूई दोसी मनीयानें आग्रही अहमि दावाद नगरें विहार कीधो । एकदा श्री गुरु मुखि पा० वजीओ सभा समक्ष धम्मोपदेश समाधि पणि सांभलि छ । एहवें वाणीतरई आवी वभ्रामणी दीधी जे लोहना गंजते अधिकरणे भर्या जिहाज समुद्रि आव्या । लाभ बहोत ( ११०-१ ) खांडा, कुसि, कुदाला, छरी, तहना शास्त्रे पाप देखाड्या | श्री गुरुनई वचनई जीवनई असमाधिनाकारक रह लोरंजित थको वणा जल सराण कीधा । हना गंजनई समुद्रमोहि गुरु मुखि एहनी आलोयाण लीधी । जो तेहनई समुद्र मांहि .... • जहां लगई चिरंजीवी रहुं आयु पर्यंत जण जण दीठ प्रवालानी जपमालीका देवी पुण्यर्थि वाणोतर कहे शेटजी है । एतले श्री गुरुई | पुनः श्री सूरीने उपदेशि समुद्रे जलचर जीवनी घणी श्री सीरोहीई, नाइलाई, गमराणी, चचरडी, आबु यन्ना कीधी | श्री गुरुनई एहवा परोपकारी देषी २०५ सत्तर सहस्र गुजरात सुभट मिल सोरठ सारी । हांटा बद्ध हज्जार ash वह व्यापारी | खंभायत निजखेत सहिर star सारीखा । हल्ला झाला हलव पांति कीधा पारिखा । पूरव उत्तर दक्षिण पश्चिम कृपाण कोइ न सकि कलि । ताहरि संघ वीरपाल तणा महाजल दुनी मली । १ । Aho! Shrutgyanam
SR No.009878
Book TitleJain Sahitya Sanshodhak Khand 01 Ank 03 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJinvijay
PublisherJain Sahitya Sanshodhak Samaj Puna
Publication Year1922
Total Pages252
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size16 MB
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