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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir १४० जीवाजीवापिगम - ९/-३६८ विसेसाहिया वा सव्वत्योया पढमसमयपंचेदिया, पढमसमयचउरिदिया विसेसाहिया, पढमसमयतेइंदिया विसेसाहिया, पढमसमयबेइंदिया विसेसाहिया, पढमसमयएगिदिया विसेसाहिया, अपढमसमयपं.दिया असंखेनगुणा, अपढमसमयचउरिदिया विसेसाहिया, जाव अपढमसमयएगिदिया अनंतगुणा, सेतं दसविहा संसारसमावण्णगा जीवा सेत्तं संसारसमावण्णगजीवाभिगमे २४४!-243 नवमी पडिवत्ती सपत्ता. - पढ मा सबजी वा-प डि व त्ती :(३६९) से किं तं सव्यजीवाभिगमे सब्बजीयेसु णं इमाओ नव पडिवत्तीओ एवमाहिति एगे एबमाहंसु-दुविहा सव्वजीवा पन्नत्ता जाव दसविहा सबजीया पन्नत्ता तत्थ णं जेते एवमाहंसु दुविहा सव्यजीवा पन्नत्ता ते एवमाहंसु तं जहा-सिद्धा चेव असिद्धा चेव, सिद्धे णं भंते सिद्धति कालओ केवचिरं होति गोयमा साइए अपज्जवसिए, असिद्धे णं भंते असिद्धेत्ति कालओ केवचिरं होति गोयमा असिद्धे दुविहे पत्रत्ते तं जहा-अणाइए वा अपञ्जवसिए, अणाइए वा सपज्जवसिए सिद्धस्सणं मंते केवतिकालं अंतरं होति गोयमा साइयस्स अपज्जवसियस्स नत्यि अंतरं असिद्धस्सणं मंते केवइयं अंतरं, होइ गोयमा अणाइयस्स अपज्जवसियस्स नस्थि अंतरं अणाइयस्स सपज्जवसियस नस्थि अंतरं एएसिणं भंते सिद्धाणं असिद्धाणं य कयरे कयरेहितो अप्पा वा बहुवा वा तुल्ला वा विसेसाहिया वा गोयमा सव्वत्थोवा सिद्धा, असिद्धा अनंतगुणा ।२४५।-244 (३७०) अहवा दुविहा सव्यजीवा पन्नत्ता तंजहा-सइंदिया चेव अणिदिया चेव सइंदिएणं भंते सइंदिएतिं कालतो केवचिरं होइ गोयमा सइदिए दुविहे पन्नते-अणाइए वा अपज्जवसिए अणाइए वा सपञ्जवसिए अणिदिए साइए वा अपज्जवसिए दोण्हवि अंतरं नस्थि, अप्पाबहुयंसव्वत्योवा अणिंदिया, सइंदिया अनंतगुणा अहया दुविहा सव्वजीवा पन्नत्ता तंजहा-सकाइया चेव अकाइया चेव सकाइपस्स संचिट्ठणंतरं जहा असिद्धस्स अकाइयस्स जहा सिद्धस्स, अप्पाबहुयंसव्यत्योवा अकाइया, सकाइया अनंतगुणा अहवा दुविहा सव्वजीवा पन्नत्ता तं जहा-अजोगी य सजोगी य तघेय अहवा दुविहा सच्यजीवा पन्नत्तातं जड़ा-सवेदगा चेव अवेदगा चेव सवेदए णं भंते सवेदएत्ति कालतो केवचिरं होति गोयमा सवेदए तिबिहे पन्नत्ते तं जहा-अणादीए वा अपज्जयसिते अणादीए वा सपज्जयसिए साइए वा सपञ्जयसिए तत्य णं जेसे साइए सपज्जवसिए से जहण्णेणं अंतोमहत्तं उककोसेणंअनंत कालं-अनंताओ उस्सप्पिणी-ओसप्पिणीओकालओ खेत्तओअवइट पोग्गलपरियट्ट देसूणं, अवेदए णं मंते अवेदएत्ति कालओ केवचिरं होति गोयमा अवेदए दुयिहए पन्नते तं जहा-साइए वा अपज्जवसिते साइए वा सपञ्जवसिते तत्थ णं जेसे सादीए सपञ्जवसिते से जहपणेणं एक्कं समयं उक्कोसेगं अंतोमुहत्तं, सवेदगस्सणं भंते केवतियं कालं अंतर होति गोयमा अणादियस्स अपज्जवसियस्स नत्थेि अंतरं अणादियस्स सपज्जवसियरस नत्थि अंतरं सादीयस्स सपज्जवसियस्स जहणेणं एक्कं समयं उक्कोसेगं अंतोमंहुत्तं, अवेदपस्स णं मंते केवतियं कालं अंतरं होई गोयमा साइयस्स अपजवसियस्स नत्थि अंतरं साइयस्स सपज्जवसियस्स जहण्णेणं अंतोमुहत्तं उक्कोसेणं अनंतं कालं जाय अवड्ढे पोग्गलपरियट देसूणं, अप्पाबहुग-सब्यस्थोया अवेदगा, सवेदगा अनंतगुणा अहवा दुविहा सव्वजीवा-सकसाई य अकसाई य सकसाई जहा सवेदए अकसाई जहा अवेदए, सव्वत्योदा अकसाई, सकसाई अनंतगुणा अहवा दुविहा सन्व For Private And Personal Use Only
SR No.009740
Book TitleAgam 14 Jivajivabhigama Uvangsutt 03 Moolam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDipratnasagar, Deepratnasagar
PublisherAgam Shrut Prakashan
Publication Year1996
Total Pages162
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Agam 14, & agam_jivajivabhigam
File Size3 MB
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