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________________ ५ - जिनेन्द विंद छन्द गाथा (फूलना क्र ३२) (विषय : नन्द पाँच, आत्म स्वरूप की महिमा) परम पय परम परम जिननाह हो, परम भाव उवलद्धऊ । परमिस्टि इस्टि संदर्सियऊ, अप्पा परमप्प ममल न्यान सहकारं ॥ १ ॥ भावार्थ :- आत्मन् ! तुम] (परम पय) परम पद के धारी (परम परम) उत्कृष्ट श्रेष्ठ (जिननाह हो) जिननाथ हो (परम भाव ) परम पारिणामिक भाव को (उवलद्धऊ) उपलब्ध करो (अप्पा) मैं आत्मा (ममल न्यान) ममल ज्ञानमयी (परमप्प) परमात्मा हूँ (सहकारं) ऐसा स्वीकार कर ( इस्टि) प्रयोजनीय (परमिस्टि) परमेष्ठी स्वभाव का (संदर्सियऊ) दर्शन करो । केवल नंत नंत संदर्सिऊ, तं उवएसु नंत ममल अन्मोयह । भय विनस्य भव्य नंत नंत तं सहिऊ, कम्म षय मुक्ति गमन सहकारह ॥ २ ॥ भावार्थ :- (केवलि) श्री केवलज्ञानी परमात्मा (जं) जैसे [अपने] (नंत नंत) अनन्त चतुष्टयमयी स्वभाव को (संदर्सिऊ) देखते अर्थात् अनुभव करते हैं (तं) वैसे ही (नंत) अनन्त ज्ञानमयी (ममल) ममल स्वभाव की (अन्मोयह) अनुमोदना करने का (उवएस) उपदेश देते हैं (भव्य) जो भव्य जीव (नंत नंत) अनन्त चतुष्टयमयी ( तं सहिऊ) स्वभाव सहित होते हैं अर्थात् स्वभाव का श्रद्धान, ज्ञान, आचरण करते हैं [उनके ] ( भय विनस्य) भय विनस जाते हैं [ यह साधना ] (कम्मषय) कर्म क्षय और (मुक्ति गमन) मुक्ति को प्राप्त करने में (सहकार) सहकारी होती है। जिनेंद विंद लोयलोय ऊर्ध सुद्ध उत्तयं । तं न्यान दिस्टि परम इस्टि परम भाव जलपियं ॥ तं कम्म षेउ मोष्य हेऊ भव्य लोय पोसियं । १६८ आनंद नंद चेयनंद परमनंद नंदितं || ३ II भावार्थ :- (जिनेंद) जिनेन्द्र परमात्मा (विंद) स्वानुभूति में लीन रहते हुए (लोय लोय) लोकालोक को जानते हैं [उनकी] ( ऊ र्ध सुद्ध उत्तयं) श्रेष्ठ शुद्ध दिव्य ध्वनि खिरती है [ भगवान ने] (परम इस्टि) परम इष्ट (परम) श्रेष्ठ (न्यान) ज्ञान (भाव) स्वभाव (तं) को (दिस्टि) दृष्टि में लेने के लिये (जल पियं) कहा है [उपदेश दिया है, जिनेन्द्र भगवान के वचन ] ( तं कम्म बेउ) कर्मों को क्षय करने और (मोष्य हेऊ) मोक्ष की प्राप्ति में हेतु हैं (लोय) जगत के (भव्य) भव्य जीवों को (नंद) नन्द (आनंद) आनन्द (चेयनंद परमनंद) चिदानंद परमानंद से (नंदितं) आनंदित करते हुए (पोसियं) पोषित करने वाले हैं । कमट्ठ गट्ट तं अनिट्ठ ममल भाव छिन्नियं । तं सुद्ध न्यान सुद्ध ज्ञान नंतानंत दर्सियं ॥ तं राय दोस मिथ्य भाव सल्य भय निकंदनो । तं परम भाव परम उत्तु परम लग्य लभ्यनो ॥ ४ ॥ भावार्थ :- [हे आत्मन् !] (कमट्ठ) आठ कर्मों के (गट्ठ) समूह (तं अनिट्ट) अनिष्टकारी हैं [ किन्तु ] (ममल भाव) ममल स्वभाव में रहने से (छिन्नियं) क्षय हो जाते हैं, [ज्ञानी साधक ] (सुद्ध झान) शुद्ध
SR No.009715
Book TitleGyanodaya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTaran Taran Gyan Samsthan Chindwada
PublisherTaran Taran Gyan Samsthan Chindwada
Publication Year
Total Pages207
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size2 MB
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