SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 297
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ वक्रोक्तिजीवितम् रमणीयतायुक्त वर्ण्यमान वस्तु की उपयुक्तता के सौन्दर्य को प्रकाशित करता हुआ रसिकजनों के हृदयों को आनन्द प्रदान करने वाली प्रत्ययवक्रता को धारण करता है । इदानीमेतस्याः प्रकारान्तरं पर्यालोचयति २३४ आगमादिपरिस्पन्दसुन्दरः शब्दवक्रताम् । परः कामपि पुष्णाति बन्धच्छाया विधायिनीम् ॥ १८ ॥ अब इस ( प्रत्ययवक्रता ) के अन्य भेदों को विवेचित करते हैं आगमादि के विलास से रमणीय दूसरा ( प्रत्ययवक्रता का ) भेद विन्यास के सौन्दर्य को उत्पन्न करने वाली शब्द वक्रता का पोषण करता है ।। १८ ।। परो द्वितीयः प्रत्ययप्रकारः कामप्यपूर्वा शब्दवत्रतामाबध्नाति वाचकवक्रभावं विदधाति । कीदक भागमा विपरिस्पन्दसुन्दरः । भागमो मुमादिरादिर्यस्य स तथोक्तः, तस्यागमादेः परिस्पन्दः स्वविलसितं तेन सुन्दरः सुकुमारः । कीदृशों शब्दवक्रताम्- -बन्धच्छायाविधायिनों संनिवेशकान्तिकारिणीमित्यर्थः । यथा ――― पर अर्थात् दूसरा प्रत्यय ( वक्रता ) का भेद किसी अपूर्व शब्दवक्रता को उत्पन्न करता है अर्थात् वाचक वकता की सृष्टि करता है । कैसा ( प्रत्ययप्रकार ) ? आगमादि के परिस्फुरण से रमणीय । आगम अर्थात् मुम् इत्यादि है आदि में जिसके उसे आगमादि कहते हैं । उस आगमादि का परिस्पन्द अर्थात् अपना वैभव उससे सुन्दर अर्थात् कोमल ( प्रत्यय प्रकार शब्दवक्रता को पुष्ट करता है ) । कैसी शब्दवक्रता को — बन्ध की शोभा को उत्पन्न करने बाली अर्थात् विन्यास के सौन्दर्य की सृष्टि करने वाली ( शब्दवक्रता को पुष्ट करता है ) । जैसे जाने सख्यास्तव मयि मनः संभुतस्नेहमस्मादित्थंभूतां प्रथमविरहे तामहं तर्कयामि । वाचालं मां न खलु सुभगंमन्यभावः करोति प्रत्यक्षं ते निखिलमचिराद् भ्रातरक्तं मया यत् ॥ ६६ ॥ ( मेघदूत में विरही यक्ष अपनी प्रेयसी की निज विरह-दशा का वर्णन कर, मेघ को अत्यधिक विश्वास दिलाने के लिये उससे कहता है कि हे मेघ ! ) मुझे मालूम है कि तुम्हारी सहेली ( अर्थात् मेरी कान्ता ) का हृदय मेरे विषय में प्रेम पूर्ण है, अन एवं ( अपने ) प्रथम वियोग के अवसर पर उसे
SR No.009709
Book TitleVakrokti Jivitam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRadhyshyam Mishr
PublisherChaukhamba Vidyabhavan
Publication Year
Total Pages522
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size21 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy