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________________ ( १७३ ) ( ४ ) जयदो विद्याकानां निधिः ॥ श्री सूरीश्वरमूर्द्धवन्दितपदः श्री सिद्धमूरिगुरु( ५ ) मजोदयत्ता रकत्येतिनिपुणो वर्वर्त्ति सर्वोपरि ॥ १ ॥ प्रासादस्य कृतास्य तेन ( ६ ) विदुषा माघस्य शुक्के बुधौ व्योदश्यां श्रुतिससनन्दकुमिते श्री विक्रमाब्देऽधुना । ( 9 ) सौजन्यात मृतसागरेण जगतां धर्मोपकाराय वै श्रीमऔौनधुरंधरेण कृतिना नूनं (८) प्रतिष्ठानघाः ॥ २ ॥ श्री विक्रम संवत् १९७३ माघ शुद्ध १३ बुधवारके दि ( ए ) न श्री मदरास पत्तन शाहूकार पेठ में श्री चन्द्रप्रस्वामी विश्व प्रतिष्ठा श्री. (१०) मौनाचार्य बृहत्स्वरतरगच्छीय जं । खु । जट्टार्क श्री जिनसिद्ध सूरिजी । ( ११ ) महाराज के करकमलों से समस्त संघ सहित जैरुबकसजी सुखलालजी । ( १२ ) समदमिया ने बड़े महोत्सव से कराई। दषचंद रूपचंदजी ने वित्र स्थाप (१३) न किया वादरमलजी ने कलश चढ़ाया और इंसराजजी सागरमलजी ( १४ ) ने ध्वजा खारोपण करी यह मंगल कार्य श्री संघको सर्वदा श्रेयकारी हो । (१५) ॥ इस्ताक्षराणि यति किशोरचन्द्रजीतविष्य मनसा चन्द्रस्य ॥ श्री दादाजी के बंगले में । ॐ नमः दत्तसूरिजी [ 2071 ] ॐ नमः कुशलसूरिजी मिति माइ सुदि ५ संवत् १९३६ का । पेठ 1 जैन मंदिर - साहुकार पंचतीर्थयों पर | [2072] संवत् १४९१ वर्षे माघ सुदि ५ बुधौ श्रीमाल ज्ञातीय नान्दी गोत्रे सा० प्रढहा पुत्र शा० प्रेतान पुत्र हरेराज सहित तत् पिता पुण्यार्थं श्री अजितनाथ बिंबं कारितं प्रतिष्ठितं श्री खरतर गये श्री जिनसागर सूरिनि ॥ ६६ "Aho Shrut Gyanam"
SR No.009679
Book TitleJain Lekh Sangraha Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPuranchand Nahar
PublisherPuranchand Nahar
Publication Year
Total Pages356
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & History
File Size7 MB
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