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________________ २७७ विद्याधिजोषनरश्मिः विद्यार्थी अपने उत्तरदायित को समझें। भावो समाज-रचना और नन राष्ट्र-सर्जन का कार्य उनके सिर पर आनेवाला हैं यह खयाल में रकरखें । वे उसके अनुरूप अपने को संस्कृत बनावें । वे अपने ध्येय पर अटल रह स्वाश्रयो बनें, नैतिक बल को विकसित करें और अपना जीवन भावो महान् कार्य के योग्य बनावें । १५-१६ इदं शिक्षणमाफल्यमिद गौरव-भाजनम् । इदं कर्तव्यसर्वस्वमिदं जीवन-मंगलम् શિક્ષણનું ચરિતાર્થ્ય આમાં છે, भामा सायु औ२१ छ, उत्तव्य-२१ आमा छ, आमालवननु ४६या छे. (१७) This contains the fruitfulr.ess of education, it is the receptacle of greatness, it is the ess-nce of human duties and in it con. sists the suspiciousness of life. (17) शिक्षण का चारितार्थ इसमें है, इममें मचा गौरव है, कर्तव्य- सर्वस्व इसमें हैं, इसमें जीवन का कल्याण है। (१७) विद्यार्थिजीवन-रश्मिः स्वोपज्ञ-गूजराती-हिन्दी-अंग्रेजो अनुदमहिता समाप्ता Aho! Shrutgyanam
SR No.009674
Book TitleSubodhvani Prakash
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNyayavijay
PublisherHemchandracharya Jain Gyanmandir Patan
Publication Year1949
Total Pages614
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Spiritual
File Size10 MB
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