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होता है। अग्निभूति, वास्तविक बात तो यह है कि संसारी जीव अमूर्त है ही नहीं! लोहे को जब अग्नि में तपाया जाता है तब लोहा अग्निरूप हो जाता है, वैसे आत्मा और कर्म अनादिकाल से जुड़े हुए हैं, अतः आत्मा कर्म रूप बनी हुई है। इस अपेक्षा से आत्मा मूर्त कही जाती है। कर्म मूर्त हैं, रूपी हैं, इनके संयोग से अरूपी आत्मा मूर्त बनी हुई है। ऐसी कर्मरूप बनी हुई आत्मा पर कर्मों के उपघात और उपकार हो सकते हैं।' __ 'भगवंत, आत्मा के साथ कर्मों का अनादिकालीन संबंध कैसे हो सकता है? मेरी समझ में यह बात नहीं बैठती है।' ___ 'अरे पंडित, बहुत सरल बात है यह । आत्मा और कर्म का परस्पर कार्यकारणभाव है! जैसे बीज से अंकुर पैदा होता है और अंकुर से बीज निष्पन्न होता है, बीज-अंकुर की परंपरा अनादि है वैसे कर्म-जीव की परंपरा भी अनादि है।'
'तो फिर आत्मा का मोक्ष कैसे हो सकता है प्रभो?' 'आत्मा और कर्म का संबंध अनादि है, इसका अर्थ यह नहीं है कि वह संबंध अनंतकालीन ही हो! अनादि संबंध का अंत हो सकता है | कर्मों का नाश होने पर आत्मा का मोक्ष होता है।' 'भगवंत, वेदों में कर्मनिषेध किया गया है - यह कैसे?'
'महानुभाव, वेदों में कर्मों का निषेध नहीं किया गया है। वेदों में कहा गया है : 'स्वर्गकामो अग्निहोत्रं जुहुयात् ।' 'स्वर्ग पाने की इच्छावाले को अग्निहोम करना चाहिए।' यह विधान, यदि कर्म का अस्तित्व नहीं मानें तो निरर्थक बन जाएगा। अग्निहोम करनेवाला जीव स्वर्ग में कैसे जाएगा? ___मनुष्य शरीर नष्ट हो जाता है, फिर जीव को स्वर्ग में कौन ले जाता है? अग्निहोम करने से शुभ कर्म बंधता है और वह शुभ कर्म स्वर्ग में जीव को ले जाता है। बिना कारण, कार्य हो नहीं सकता है। यदि कर्म को कारण नहीं मानोगे, तो स्वर्ग-प्राप्ति का दूसरा कारण बताना पड़ेगा न?' ___ 'भगवंत, हम तो मानते हैं कि ईश्वर ही जीव को स्वर्ग में भेजता है और नरक में भी ईश्वर ही भेजता है! अरे, इस सृष्टि की रचना भी ईश्वर ने की है - वैसी हमारी (ब्राह्मणों की) मान्यता है।' ___ 'परंतु महानुभाव, ईश्वर ये सारे काम कैसे करता है? क्या ईश्वर शरीरधारी है? क्या कार्य करने के साधन-उपकरण हैं उसके पास? कुम्हार घड़ा बनाता है,
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