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________________ वस्तीन पाते हैं। अब शायद कारण-कार्य की समस्या का समाधान हो जाय, यदि हम इन दो निम्नलिखित प्रश्नों का उत्तर दें (1) हमारे लिये यह कहना क्यों जरूरी हो जाता है कि बिना कारण के कोई भी कार्य की धारणा नहीं हो सकती है? परन्तु एक बात ध्यान देने योग्य है, वह यह है कि यद्यपि पुनरावृत्ति से वस्तुगत गुणों का निर्माण नहीं हो सकता है तो भी इसका विशेष प्रभाव हमारे मन पर पड़ सकता है। (A constant conjunction can never produce a new quality in the object, but it produces an effection the mind) इसका प्रभाव है कि वस्तुओं के नित्य संयोग से हमारे अन्दर मानसिक आदत हो जाती है, जिसकी वजह से यदि एक वस्तु हमारे सामने आये तो हम दूसरी वस्तु की प्रतीक्षा करने लगते हैं। यदि आग और ताप बार-बार हम अनुभूत करते हों, तो हमारे अन्दर मानसिक प्रतीक्षा की ऐसी आदत हो जाती है कि आग को देखते ही हम ताप की कल्पना करने लगते हैं। अतः कारण-कार्य के अनिवार्य लगाव का सम्बन्ध वस्तुनिष्ठ नहीं, परन्तु आत्मनिष्ठ (subjective) है। हमारे अन्दर ऐसी बाध्यता आ जाती है कि एक वस्तु को देखकर हम अवश्य ही दूसरी वस्तु की प्रतीक्षा करने लगते हैं। यदि हम कारण-कार्य के सम्बन्ध की उत्पादन प्रक्रिया पर ध्यान दें तो इसमें दो अंग देख पाते हैं, अर्थात् घटनाओं के बीच नित्य संयोग का होना और फिर सहचार नियमों से संचालित मानसिक कल्पना में अनिवार्य प्रतीक्षा का होना। परन्तु यदि ह्यूम की व्याख्या को मान लें तो वास्तव में वह नहीं आयेगा। इसलिए वैज्ञानिक नियम, जो वस्तुगत सम्बन्धों पर आधारित हैं, कभी भी असंदिग्ध नहीं ठहर सकेंगे। यही कारण है कि ह्यूम की विचारधारा को संदेहवाद कहा जाता है। राम कार्य-कारण-सम्बन्ध की अवधारणा का निषेध नहीं करते हैं बल्कि उनका कहना है कि इसकी जानकारी न बुद्धि से संभव है और न अनुभव से अनिवार्यता और सार्वभौमिकता का ज्ञान संभव हो सकता है। इसीलिए सी.ई. एम. जोड ने लिखा है कि "They would, therefore, be inclined to agree with Hume that the only thing that distinguishes a purely temporal sequence "this after that" from a causal sequence "this because of that" is the grater regularity of the latter....but that we do not say "night is the cause of day"..... good example of what is commonly called causal connection." यही कारण है कि इमानुएल काण्ट ने भी माना है कि हम ने मुझे गहरी निंद्रा से जगा दिया है। दर्शन के इतिहास में इनकी महत्ता को दर्शाते हुए सी.ई.एम. जोड ने बतलाया है कि "It is on these lines that a short modern statement of the sort of position which Hume sought to maintain would run. The position is, as I have already remarked, of very great importance in the history of philosophy and has subsequently been developed in various ways. I propose to give one or two examples of the 121
SR No.009501
Book TitleGyan Mimansa Ki Samikshatma Vivechna
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages173
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Metaphysics, & Philosophy
File Size1 MB
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