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द्ध गुग्गुलु का प्रयोग करें। इसी प्रकार शुद्ध शिलाजीत का भी प्रयोग करे।
विद्रधि की पाक से रक्षापाकं च वारयेद्यत्नात् सिद्धिः पक्वे हि दैविकी।। अपि चाऽऽशु विदाहित्वाद्विद्रधिः सोऽभिधीयते। .
सति चालोचयेन्मेहे प्रमेहाणां चिकित्सितम्।। ___ार्थ : विद्रधि शोथ पकने न पावे इसके लिए यत्न परिश्रम–पूर्वक करें;
योंकि विद्रधि के पक जाने पर उसकी चिकित्सा दैवाधीन होती है। यदि द्रधि होने वाली हो तो प्रमेह की चिकित्सा के साथ दोषानुसार विद्रधि की चकित्सा करनी चाहिए। .
. स्तन विद्रधि की चिकित्सास्तनजे व्रणवत्सर्व न त्वेनमुपनाहयेत्।... पाटयेत्पालयन् स्तन्यवाहिनीः कृष्णचूचुकौ।।
सर्वास्वामाद्यवस्थासुन निर्दुहीत च तत्स्तनम्। र्थ : स्तन में उत्पन्न विद्रधि की व्रण के समान (भेदन, शोधन, रोपण) चकित्सा करनी चाहिए। किन्तु दुग्धवाहिनी तथा स्तन चूचूक के कृष्ण भाग को रक्षा करते हुए शस्त्र कर्म करें और सभी आम पच्यमान तथा पक्वावस्था स्तन से दूध निकालते रहना चाहिए। श्लेषण : प्रायः संतान होने पर सन्तानें मर जाती हैं अथवा जो स्त्रियाँ न्तान को दूध नहीं पिलाती हैं या स्वयं सन्तान दूध नहीं पीती है तो स्तन आया हुआ दूध एकत्र होकर शोथ तथा वेदना उत्पन्न करता है। यदि इस वस्था में दूध निकाल दिया जाय तो वेदना तथा शोथ शान्त हो जाता है। दि दूध नहीं निकाला जाता है तो शोथ में विदोह होकर पक जाता है। ऐसी वस्था में चूचूक और दूध-वाहिनी की रक्षा करते हुए सीधा चीरा लगाकर शोर
रोपण क्रिया करें। स्तन विद्रधि की किसी भी अवस्था में उपनाह न बाँधे तथा चीरा गाने पर भी पट्टी न बाँधे। .. . वात जन्य वृद्धि की चिकित्सा- . ...
(अथ वृद्धिरोगचिकित्सतम) ... शोधयेत्तिवृतास्निग्धं वृद्धौ स्नेहैश्चलात्मके।।
कोशाम्रतिल्वकैरण्डसुकुमारकमिश्र कैः। . ततोऽनिलघ्ननि!हकल्कस्नेहैर्निरूहयेत्।। . . रसेन भोजितं यश्टितैलेनान्वासयेदनु। .....
स्वेदप्रलेपा वातघ्नाः पक्वे भित्त्वा व्रणक्रिया।। __र्थ : वात जन्य वृद्धि में घृत-तैलादि से स्निग्ध रोगी को निशोथ के चूर्ण
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