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ज्ञात्वोपनाहयेत शूले स्थिते तत्रैव पिण्डिते । तत्पावपीडनात्सुप्तौ दाहादिष्वल्पकेशु च।। पक्वः स्याद्विद्रधि भित्वा व्रणवतमुपाचरेत् । अन्तर्भागस्य चाप्येतच्चिहं पक्वंस्य विद्रधेः।। पक्वः स्रोतांसि सम्पूर्य स यात्यूलमधोऽवा। स्वयं प्रवृतं तं दोषमुपेक्षेत हिताशिनः।। दशाहं द्वादशाहं वा. रक्षेदिभषगुपद्रवान्। असम्भ्यग्वहति क्लेदे वरूणादिसुखाम्भसा।। . पाययेन्मधुशिग्र वा यवागू तेन वा कृताम्।
यवकोलकुलत्थोत्थयूषैरन्नं च शस्यते ।। अर्थ : बाहर उठे हुए पच्मान कोष्ठस्थ (आभ्यन्तर) विद्रधि का जानकर उस पर उपनाह स्वेदन करे। उपनाह करने से वेदना के शान्त हो जाने पर तथा विद्रधि के पिण्डाकार हो जाने पर और उसके आसपास दबाने पर वेदना न हो तथा दाह आदि थोड़ा हो तो विद्रधि पकी हुई होती है। इस स्थिति में विद्रधि का भेदन कर व्रण के उपचार के समान उपचार करे। अन्तःभाग में स्थित पक्व विद्रधि का यह चिन्ह है। पक्व विद्रधि स्रोतसों को बन्द कर ऊट र्व भाग या अधोभाग में स्थित होकर बहती है। ऐसी स्थिति में अपने आप निकलते हुए दोष पूय की उपेक्षा करे। हितकर आहार का सेवन करते हुए दस दिन या बारह दिन तक उपद्रवों से रक्षा करें। यदि पूय अच्छी तरह न बहे तो वरूणादिगण के क्वाथ में मीठे सहिजन को मिलाकर पान करें या उसके क्वाथ से यवागू बनाकर पान कराये। अथवा यव, बेर तथा कुरथी के पकाये जल से विधिवत् सिद्ध अन्न खिलावे।
विद्रधि के दस दिन के बाद का उपचारऊर्ध्व दशाहात्त्रायन्तीसर्पिषा तैल्वकेन वा। शोधयेद्वलतः शुद्धः सक्षौद्रं तिक्तकं पिबेत् ।।
सर्वशो गुल्मवच्चैनं यथादौषमुपाचरेत्। अर्थ : विद्रधि के उपद्रवों से रक्षा करते हुए दस दिनों के बाद त्रायन्तीघृत या तैल्वक घृत से शोधन करें। अच्छी तरह शुद्ध हो जाने पर तिक्तक घृत में शहद मिलाकर पान करें। इस प्रकार आभ्यन्तर विद्रधि की सभी प्रकार से गुल्म की तरह दोषों के अनुसार चिकित्सा करें।।
___ सर्वावस्थासु सर्वासु गुग्गुलुं विद्रधीषु च।।
• कशायैयौगिकैर्युज्यात् स्वैः स्वैस्तद्वच्छिलाजतु। . अर्थ : सभी विद्रधियों की समी अवस्था मेंअपने-अपने दोषानुसार यौगिक कषायों के साथ
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