________________
अर्थ : चन्दन, कमल, खस तथा आग में पकाया मिट्टी का ढेला समभाग इन सबों का चूर्ण बनाकर रात को जल में भिगोंकर तथा ऊपर का जल निथार कर प्रातः मधु एवं मिश्री मिलाकर पान करे तथा प्रातः भिगोंकर शाम को छानकर मधु तथा मिश्री मिलाकर पान करे। यह रक्त-पित्त में अधिक रक्त स्राव को रोकता है।
रक्त-पित्त में इक्षु गण्डिका का प्रयोगआपो वा नवे कुम्भे प्लावयेदिक्षुगण्डिकाः । स्थितं तद्गुप्तमाकाशे रात्रि प्रातः श्रुतं जलम् ।। मधुमृद्वीकजाम्भोजकृतोत्तंसं च तद्गुणम् ।
अर्थ : नये मिट्टी के घड़े में गन्ने की गड़ेरियों को कुचलकर तथा पानी भर कर और घड़े का मुख बन्दकर खुले आकाश में रातभर रहने दे और प्रातःकाल छानकर तथा मधु मुनक्का का रस एवं कमल के पत्तों का रस मिलाकर पान करें। यह रक्त-पित्त में अधिक रक्त स्राव को रोकता है।
रक्त-पित्त में पित्त ज्वरोक्त कषाय का निर्देशये च पित्तज्वरे चोक्ताः कषायास्तां योजयेत् । ।
अर्थ : पित्त ज्वर में जिन-जिन कषायों के पान करने का निर्देश किया गया हो इन इन कषायों को रक्त-पित्त में प्रयोग करें।
रक्त- - पित्त में विविध दूध का प्रयोगकशार्यौ विविधैरेभिर्दीप्तेऽग्नौ विजिते कफ । रक्तपित्तं न चेच्छाम्येत्तत्र वातोल्बणे पयः । । युज्ज्याच्छागं श्रुतं तद्वद्गव्यं पच्चगुणेऽम्भसि । पच्चमूलेन लघुना श्रुतं वा ससितामधु ।। जीवकर्षभकद्राक्षाबलागोक्षुरनागरैः ।
पृथक्पृथक् श्रुतं क्षीरं सघृतं सितयाऽथवा ।
अर्थ : ऊपर बताये गये अनेक प्रकार के कषायों के सेवन से अग्नि के प्रदीप्त होने तथा कफ शान्त होने पर रक्त-पित्त शान्त न हो और वात की प्रधानता हो तो, निम्नलिखित दूध का प्रयोग करें। बकरी का पकाया दूध, लघुपच्चमूल में (सरिवन, पिठवन, भटकटैया, वनभंटा तथा गोखरू) के पाँच गुने क्वाथ में पकाया गाय का दूध अथवा उस दूध में मिश्री तथा मधु मिलाकर या जीवका, ऋषभक, मुनक्का, बरियार, गोखरू तथा सौंठ इन सबों में एक-एक से पकाये हुए दूध में घृत तथा मिश्री मिलाकर पीने को दें ।
45