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- विदारिगन्धा मुद्गाश्वं बला सर्पिहरेणुका। अर्थ : अधोग रक्त-पित्त में (1) लाल कमल तथा नील कमल का केशर, पिठवन तथा फूल प्रियंगु; (2) खस, सावर लोध, सोंठ तथा लाल चन्दन, (3) हाड बेर, धाय का फूल, बेलका गुदा तथा दुरालभा (यवासा) इन आधे श्लोक से कहे गये द्रव्यों की जड़ से निर्मित पेया का प्रयोग करे। इसके बाद श्लोक के एक-एक पाद निर्मित पेया, को कहेंगे। (1) चिरा-यता, खस तथा नागर मोथा, (2) मसूर तथा पिठवन, (3) विदारीकन्ध तथा मूंग, (4) बरियार की जड़ तथा हरेनु इन द्रव्यों के जल से निर्मित पेया रक्तपित्त में प्रयोग करे। . विश्लेषण : ऊपर बताये गये सात योगों से सात पेयां का विघात किया गया है। इन योगों के द्रव्य निर्मित 10 ग्राम को लेकर तथा कूटकर 640 ग्राम जल में पकायें। जब जल 320 ग्राम रह जाये तब उसमें पेया का निर्माण करें। ... .... रक्तपित्त में आहार द्रव्य-... . . . .
शूकशिम्बीभवं धान्यं रक्तं शाकं च शस्यते ।।
अन्नस्वरूपविज्ञाने यदुक्तं लघु शीतलम्। अर्थ : अन्न स्वरस विज्ञानीय अध्याय में जो शुक धान्य, शिम्बी धान्य तथा - शाक लघु एवं शीत वीर्य वाले कहे गये हैं वे रक्तपित्त में प्रशस्त हैं।
रक्तपित्त में पेय जलपूर्वोक्तमम्बु पानीयं पच्चमूलेन वा शृतम्।।
लघुना धृतशीतं वा मध्वम्भो वा फलाम्बुवा। अर्थ : पूर्वोक्त सोठरहित षडग पानी अथवा लघुपच्चमूल से पकाया हुआ . शीतल अथ्वा गरम कर ठण्डा किया हुआ या मधु मिलाकर जल अंथवा मीठे फल रस रक्तपित्त में पिलायें।
रक्तपित्त में वर्जनीय- .. यत्किचिद्रक्तपित्तस्य निदानं तच्च वर्जयेत। . जो आहार-विहार रक्तपित्त को उत्पन्न करने वाले, .
.. उनका सेवन न करें। ....
रक्तपित्त शामक द्रव्यवासारसेन फलिनी मृद्रोधाज्जनमाक्षिकम्।।
- पित्तासृक् शमयेत्पीतं निर्यासो वाऽटरूषकात्। 'अर्थ : अडूसा के रस के साथ फूल प्रियंगु या भूनी मिट्टी या पाठानी, शावर . लोध यां सौवीराज्जन, पिष्टी या स्वर्णमाक्षिक भसम पीने से रक्तपित्त को शान्त
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