SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 194
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ DTAP प्रश्नध्याकरण देहा=दृढाभिर्दष्ट्राभिः गाढम् अत्यन्त ' डका' दृष्टाः, फर्पिता पृथ्वीतले इत स्ततः समाकृष्टाथ ये ते, तथा मुतीक्ष्णनखैः पाटिता-द्विधा कताः अवदेहाः उर्ध्वशरीराणि येपा ते तथा, अत एष-'विमुपमधिपधणा' विमुक्तसन्धिवन्धनाः = विमुक्तानि-शिथिलीकृतानि सन्धीना-अगसधानस्थानानां वचनानि येषा ते तथा, 'वियगमगा' व्यहागाः व्यङ्गानि-खण्डितानि अगानिकरचरणकणे. नासिकादीनि येपा ते तया, एवभूता नरकजीराः परमाधामिरैः 'समतओ' समन्ततः चतुर्दिक्षु गगने 'विच्छिप्पते ' विक्षिप्यन्ते = काकरलिपस्मक्षिप्यन्ते, 'पुणो य' पुनश्च-प्रक्षेपणानन्तर ते नारकाः ‘कर-कुरर-गिद्धघोरकट्टवायस गणेहिं ' कङ्ककुररपध्रघोरकष्टदायसगणः = कङ्का:-कुरराः पक्षिविशेषाः गृध्राःमसिद्धाः, घोरकप्टवायसा धोरवष्टा =असाक्लेशकारका ये वायसा-काकास्ते तया तेपा गणै समूहैः, कीदृशैस्तैः ? इत्याह-'खरथिरदढणक्खलोहतुंडेहि ' खरस्थिरदृढनखलोहतुण्डैः खरा तीक्ष्णाः स्थिरा:-निश्चलाः ढाकठोरवस्तुतलपर इधर से उधर खेचे जाते है-घसीटे जाते है, तथा सुतीक्ष्ण नखों के प्रहारोंसे उनके उर्ध्व शरीर को दो टुकडे कर दिये जाते हैं। इस कारण (विमुकसधिबधणा) उनके सधियों के बंधन बिलकुल ढीले हो जाते हैं। (वियगमगा ) वहा नारकियों के कर, चरण, कर्ण, नासिका आदि अगों को खडित कर दिया जाता है और (समतओ विच्छिप्पते ) जिस प्रकार काकबलि दिशाओं मे फेंक दी जाती है वे विचारे नारकी भी इसी तरह से आकाश मे इधर उधर दिशाओं मे फेक दिये जाते है। (पुणोय ) फिर पश्चात् (काकुररगिद्धघोरकट्टवायसगणेहिं ) कक, कुरर, गृद्ध और असह्य क्लेश कारक वायसों-कौओ का समूह कि (खरथिरढ णक्खलोहतुडेहि ) जिनके नखतीक्ष्ण, स्थिर कठोर वस्तु के विदारण પછી જમીન ઉપર તેમને આમ તેમ ખેચે છે-ઘસડે છે, તથા અતિશય તીર્ણ नम मरावीन तमना 6 शरीरनामेटू रीना छ ते २0" विमु सधिबधणा" मना साधासाना धन तदन ढीमा २४ लय छ “वियग मगा" त्या नारीमानी हाथ, 11, आन, न माह मनानु उन ४२वामा माव छ मन "समतओ विच्छिप्पते "भ लिने न्यारे हिशामा ३४વામાં આવે છે તેમ તે બિચારા નારકીઓને પણ આકાશમા આમ તેમ ફેક वामा मा छ " पुणो य" स्या२ मा ' कककुररगिद्धधोरकटुवायसगणेहिं " ११ १२२ गीध, भने मस यातनासानास सामान सभूड," खरथिर दणखलोहतुडेहि " है मना ily नम ४y परतुमान
SR No.009349
Book TitlePrashna Vyakaran Sutram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1962
Total Pages1106
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_prashnavyakaran
File Size36 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy