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________________ मेवाधिनी टीका पद २१ सू० ४ वैक्रियशरीरभेद निरूपणम् ६५७ प्रज्ञता, संच्छ्रमाणं जग्गेणं उक्कोसेणं अंगुलस्त असंखेज्जइभागं संमूच्छिमानां मनुष्याणां जघन्येन उत्कृप्टेन चातुलस्या संख्येयभागमात्रम् औदारिकशरीरावगाहनाऽवसेया, 'गब्भवकंतियाणं पज्जत्ताण य जहणेणं अंगुलस्स असंखेइभागं, उक्कोसेणं तिरिण गाउयाई' गर्भव्युत्क्रान्तिकानां तत् पर्याप्तानाश्च मनुष्याणामौदारिकशरीरावगाहना जघन्येन अङ्गुलस्या संख्येयभागमात्रम्, उत्कृष्टेन त्रीणि गव्यूतानि अवसेया, ” ॥ सू० ३ ॥ || वैक्रियशरीरवक्तव्यता ॥ मूलम् - वेडसरी णं अंते ! कह विहे पण्णत्ते ? गोयमा ! दुविहे पण्णत्ते, तं जहा - एर्गिदियवेत्रियसरीरे व पंचिदियवेव्वियसरीरे य, जइ एगिंदि वे उयिसरीरे किं वाउकाइय एगिंदिय उव्वियसरीरे, अवाडकाइयए गिंदियवेव्विसरीरे ? गोयमा ! वाउकाइयए गिंदिय doaसरीरे नो अवाउकाइयएरिदियवे उत्रियसरीरे, जइ वाउकाइय वेडव्वियसरीरे किं सुहुमवाउकाइय वेडव्वियसरीरे, बायरवाउक्काइय वेन्निसरीरे ? गोयला ! नो सुहुन वाक्कायए गिंदिथ वे उव्वियसरी रे वायरवा उक्काइए गिंदिय देउव्वयसरीरे जड़ बायरवाउक्काइय एगिंदिय वेव्वियसरीरे किं पज्जतगवायरवाउक्काइय एगिंदिय वेडव्वियसरीरे, अपजत्तगबायरवाउक्काइय एगिंदिय वेडव्वियसरी रे ? गोयमा ! पज्जत्तगवायरवाउक्क' इय एगिंदियवेडब्बियसरीरे, नो अपजत्तगबायरवाउक्काइय एगिंदिय वेडव्वियसरीरे, जइ पंचिदियवेउब्वियसरीरे किं नेरइय पंचिदिय वेउव्वयसरीरे ? जाव किं देवपंचिदिश्वे उब्वियसरीरे गोयमा ! 3 अवगाहना अंगुल के असंख्यातवें भाग की समझनी चाहिए। संमूर्छिम मनुष्यां के औदारिकशरीर की अवगाहना जघन्य और उत्कृष्ट अंगुल के असंख्यातवें भाग की होती है । गर्भज मनुष्यों के तथा पर्याप्त गर्भज मनुष्यों के औदारिक शरीर की जघन्य अवगाहना अंगुल के असंख्यातवें भाग की और उत्कृष्ट तीन गव्यूति की समझनी चाहिए ॥ सू०३ || અંશુલના અસંખ્યાતમા ભાગની સમજવી જોઇએ. સંમૂમિ મનુષ્યાના ઔદારિકશરીરની અવગાહના જઘન્ય અને ઉત્કૃષ્ટ અંશુલના અસ`ખ્યાતમા ભાગની હૈાય છે. ગર્ભૂજ મનુષ્યના તથા પર્યાપ્ત ગજ મનુષ્યાના ઔદ્વારિકશરીરની જઘન્ય અવગાહના અગુલના મસ`ખ્યાતમા ભાગની અને ઉત્કૃષ્ટ ત્રણ ગબ્યૂતિની સમજવી જોઇએ, પ્રસૂ॰૩૫ प्र० ८३
SR No.009341
Book TitlePragnapanasutram Part 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1978
Total Pages841
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_pragyapana
File Size62 MB
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