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________________ प्रमेयबोधिनी टीका सू. १ मालाचरण योजनप्रदर्शनर इत्यादिना अन्तमङ्गलं कृतमवसेयम् । अथ प्रथममङ्गलसूत्रं प्ररूपयितुमाह ववगयजरमरणभये सिद्धे अभिवंदिऊण तिविहेणं । वंदामि जिणवरिंदं तेलोकगुरुं महावीरं ॥१॥ व्यपगतजरामरणभयान् सिद्धान् अभिवन्ध त्रिविधेन । वन्दे जिनवरेन्द्रं त्रैलोक्यगुरुं महावीरम् ।। इत्यस्य व्यपगतजरामरणभयान् सिद्धान् त्रिविधेन अभिवन्ध त्रैलोक्यगुरुं जिनवरेन्द्रं महावीरं वन्दे इत्यन्वयः, टीका-तत्र प्रथमं सिद्धपदं व्युत्पाद्यते-सितं-बद्धम् अष्टप्रकारं कर्मेन्धनं ___ इस गाथा के द्वारा अन्तिम मंगल किया है, यह समझ लेना चाहिए । अव आदि मंगल सूत्र की प्ररूपणा करते हैं शब्दार्थ-(ववगय जरभरणभये) जरा, मरण और भय से रहित (सिद्धे) समस्त प्रयोजनों को पूर्ण करने वाले सिद्ध भगवान् को (अभिवंदिऊणं) वन्दन करके (तिविहेणं) तीनो योगों से (वंदामि) वन्दन करता हूं (तेलोकगुरुं) तीनों लोकों के गुरु (महावीरं) महावीर भगवान् को ॥१॥ ____भावार्थ-जरा भरण और भय से रहित अथवा जरा और मरण के भय से रहित सिद्ध भगवन्तों को तीनों योगों से वन्दन करके, तीनों लोकों के गुरु, जिनवरो में उत्तम चरम तीर्थंकर महावीर को वन्दना करता हूँ ॥१॥ टीकार्थ-सर्व प्रथम सिद्ध, पद की व्युत्पत्ति दिखलाते हैं-सित આ ગાથા દ્વારા અતિમ મંગલ કર્યું છે. એમ સમજી લેવું જોઈ હવે આદિમંગલ રૂપ સૂત્રની પ્રરૂપણું કરવામાં આવે છે. ____ हाथ-(बरगयजरमरणभये) ४२। भ२५ मने लय २हित (सिद्धे) समस्तप्रयोनाने सिद्ध-पूर्ण ४२१व सिनावानने (अभिवदिऊण) हनीने (तिविहेण) योगाथी (वंदामि) पन्दन ४३ छु (तेलोकगुरु) र सोना शु३ — (महावीरं) महावीर मगवानने ॥१॥ ભાવાર્થ–જરામરણ અને ભય વિનાના અથવા જરા અને મરણના ભય વિનાના સિદ્ધ ભગવન્તને ત્રણ પ્રકારના યુગોથી નમસ્કાર કરીને ત્રણે લેકોના ગુરૂ, જીનવમાં શ્રેષ્ઠ ચરમ-છેલા તીર્થકર મહાવીર સ્વામીને વંદના કરૂ છુ. ૧૫ ટીકાથ-સર્વ પ્રથમ સિદ્ધપદની વ્યુત્પત્તિ બતાવાય છે સિત અર્થાત બંધાએલા
SR No.009338
Book TitlePragnapanasutram Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1974
Total Pages975
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_pragyapana
File Size63 MB
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