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________________ प्रमैयद्योतिका टीका प्र.९ सू.१३९ दशविध सं० स० जीवनिरूपणम् . १३७ कालः एकेन्द्रियाणाम् स च कालः अनन्तं कालम् अनन्ता उत्सर्पिण्यवसपिण्या कालतः, क्षेत्रतोऽनन्ता लोका असंख्येयाः पुद्गलपरावर्ताः, तेच पुदलपरावर्ता आवलिकाया असंख्येयो भागः, 'बेइंदिय तेइंदिय चउरिंदियाणं संखेज्जं कालं' . द्वि-त्रि-चतुरिन्द्रियाणामप्रथमसमयवतां पूर्ववत् १ उत्कर्षतः संख्येयकालम् तत ..ऊर्ध्वमवश्यमुद्वर्तनात् । 'पंचिंदियाणं सांगरोवमसहस्सं साइरेगं' अप्रथमसमयपञ्चेन्द्रियाणां क्षुल्लकभवग्रहणम्-सातिरेकसागरोपमसहस्रश्च जघन्योत्कर्षाभ्याम् । ___ अथैषामन्तरमाह-'पढमसमय एगिदियाणं केवईयं -अंतरं - होइ! प्रथमसमयैकेन्द्रियाणां. कियच्चिरमन्तरम् ? भगवानाह-गौतम ! 'जहन्नेणं बेखुड्डाग काय में भी उत्पाद हो जाता है । 'उक्कोसेणं एगिदियाणं वणस्सइकालो'.और उत्कृष्ट से एकेन्द्रियादिक जीवों का. कायस्थिति काल वनस्पतिकाल प्रमाण है 'बेइंदियाणं तेइंद्रियाणं-चरिंदियाणं संखेज :कालं' दोइन्द्रिय तेइंद्रिय और चौइन्द्रिय जीवों का कायस्थिति का काल - उत्कृष्ट से संख्यात काल प्रमाण है इसके बाद नियम से अन्यत्र उत्पन्न हो जाते हैं |, "पंचिंदियाणं सागरोवमसहस्सं साइरेग पञ्चेन्द्रिय जीवों की जो कि अप्रथम समयवर्ती हैं कायस्थिति का काल जघन्य से तो एक समय कम क्षुल्लक भव ग्रहणरूप है. और उत्कृष्ट से एक हजार.सागरोपम की है। ... : • , अन्तर कथन-'पढम -समय एगिदियाणं केवइयं अंतर होई' हे भदन्त ! जो प्रथम समयवर्ती एकेन्द्रिय जीव है उनका अन्तर कितने : काल का है ? उत्तर में प्रभु कहते हैं-'गोयमा ! जहन्ने] दो खंडाग ...मी शरीशमा (यमi) ५] २४ नय छ. 'उक्कोसेणं एगिदियाणं वणसह कालो' भने कृष्टथी मेद्रियवाय ना ४iय स्थितिमा - वनस्पति ४ मा छे. 'बेइंदियाणं तेइंदियाणं चरिंदियाणं संखेज कालं' में द्रिय, તે ઈદ્રિય અને ચાર ઈદ્રિયવાળા 'જીને કાર્ય સ્થિતિને કાળ"ઉત્કૃષ્ટથી સંધ્યાકાળ પ્રમાણે છે. તે પછી નિયમથી તેઓ બીજે ઉત્પન્ન થઈ જાય છે. 'पंचिंदियाणं सागरोवमसहस्सं साइरेग' मप्रथम समयवती पश्यन्द्रिय वानी કાયસ્થિતિને કાળ જઘન્યથી એક સમય કમ ક્ષુલ્લક ભવ ગ્રહણ રૂ૫ છે અને ઉત્કૃષ્ટથી એક હજાર સાગરેપમાને છે. मत२ द्वारनु थन' . . 'पढमसमयएगिदियाणं केवइयं कालं अंतर होई' . मावन् ! प्रथम સમયવતી જે એકેન્દ્રિય જીવ છે, તેનું અંતર કેટલા કાળનું કહેલ છે? આ प्रश्न उत्तरमा प्रभुश्री ४ छे ?-'गोयमा ! जहण्णेणं दो खुड्डाग भवग्गहणाई
SR No.009337
Book TitleJivajivabhigamsutra Part 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1974
Total Pages1588
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_jivajivabhigam
File Size117 MB
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