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________________ भगवती देशका यावन्त स्ते सर्वेऽपि अनन्तरोपपन्नकवदेव धातव्याः 'परंपरा परंपरप्त. रिसा' परम्परोद्देशकाः परम्परोपपन्न कोद्देशक सदृशा ज्ञातव्याः चरमा अचरमा अपि एवमेव-परम्परोपपन्नावदेवेति ‘एवं एए एकारस उद्देसगा' एवं पूर्वोक्त प्रकारेण एते-पू#क्ता एकादशोदेशकाः चतुस्त्रिंशत्तमशतके प्रथमैकेन्द्रियशते भवन्तीति ।।३४।१।४=११॥ इति श्री-विश्वविख्यातनगद्वल्लभादिपदभूषितवालब्रह्मचारि - ‘जैनाचार्य' पूज्यश्री-घासीलालचतिविरचितायां "श्री भगवती सूत्रस्य" पमेयचन्द्रिकाख्यायां व्याख्यायां चतुस्त्रिंशत्तमे शतके प्रथमस्य एकेन्द्रियशनकस्य चतुर्थ एवं एकादशोद्देशकः समाप्त ॥३४-४-१-११॥ इति प्रथममेकेन्द्रिय श्रेणिशतकं समाप्तम् । अनन्तरोद्देशक हैं वे सब अनन्तरोपपन्नक के जैसे हैं 'परंपरा परंपरसरिला' एवं परम्परोद्देशक परम्परोदेशक के जैसे हैं तथा चरम और अचरम भी इसी प्रकार अर्थात् परम्परोपपन्नक के जैसे ही जानना चाहिये । 'एवं एए एकारल उद्दे सगा' इस प्रकार से ये ३४ वें शतक में प्रथम एकेन्द्रिय शतक में ११ उद्देशक हैं ॥मृ० १॥ . जैनाचार्य जैनधर्मदिवाकर पूज्यश्री घासीलाल जीमहाराजकृत "भगवतीसूत्र" की प्रमेयचन्द्रिका व्याख्याके चोतीसवें शतक का चार से ग्यारहवां उद्देशक समाप्त ॥३४-१-४-११॥ यह पहला एकेन्द्रियश्रेणि शतक समाप्त हुआ। चरमा य अचरमा य एव चेव' २८सा मन त श छे, ते मया मनत५. પન્નક પ્રમાણે છે. તેમ સમજવું. એવં પરંપરેદ્દેશક પરમ્પરેપનદેશક प्रमाणे छ. तथा यम मन मयरम ५ मा प्रभारी समन्व! 'एवं एए एक्कारस उद्देसगा' मा रीते २५३४ देशामे। ४ा छे. ॥१०॥ જૈનાચાર્ય જૈનધર્મદિવાકર પૂજ્યશ્રી ઘાસીલાલજી મહારાજકૃત “ભગવતીસૂત્રની પ્રમેયચન્દ્રિકા વ્યાખ્યાના ત્રીસ શતકના ચારથી અગીયાર ઉદ્દેશ સમાપ્ત ૩૪–૧–૪–૧૧ પહેલુ એકેન્દ્રિયશતક સમાપ્ત થયું. .
SR No.009327
Book TitleBhagwati Sutra Part 17
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1972
Total Pages812
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_bhagwati
File Size54 MB
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