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________________ पद्रिका टीका श०२५ उ. ३ सू०६ श्रेण्याः सादित्वादिनिरूपणम् ६९३ " अंन्तरहिता अपि न । 'नो अगाइयाओ - सपज्जवसियाओं' नो अनादिकाः - सपयेसिताः, आदिरहिता अन्तसहिता अपि न किन्तु 'अगाइयाओ - अपज्जवसियाओ' अनादिकाः - अपर्यवसिताः आद्यन्तरहिता इमाः श्रेणयः सन्वीति । अत्र च सामान्यतः श्रेणयो विवक्षिताः अतो याः लोकेऽलोके च श्रेयः तासां सर्वासां ग्रहणं सर्व ग्रहणाच्च ताः श्रेणयोऽनादिकः अपर्यवसिताः आद्यन्तरहिताः । अत्र एक एव भङ्गकोऽनुमन्यते शेष भङ्गकत्रयस्य तु प्रतिषेध एवेति । ' एवं जान उडूमहाययाओ' एवं यावत्- - उर्ध्व ४ ४ आयता अपि श्रेणयः अनादयोऽनन्ताः । यावत् पदेन माचीप्रातीच्यायताः दक्षिणोत्तरायताः इति द्वयोः संग्रहः । एताः सर्वा अपि-अनादिका अनन्ता इत्यर्थः । 'लोगागाससेढीओ णं भंते' लोकाकाशश्रेयः खलु भदन्त ! कि अणाश्याओ सपज्जवसियाओ' आदि रहित और अन्त सहित भी नहीं हैं । किन्तु - 'अणाश्याओ अपज्जवसियाभो' ये आदि और अन्त रहित हैं - अनादि अनन्त हैं | यहां पर सामान्य से श्रेणिय विवक्षित हुई हैं। इसलिये लोक में और अलोक में जो श्रेणियां हैं, उन सब का ग्रहण हो जाता है और उन सब के ग्रहण से ये श्रेणियां अनादि अनन्त हैं ऐसा ज्ञान होता है। यहां चार भों में से यह एक ही भङ्ग मान्य हुआ है । बाकी के तीन भङ्ग नही । ' एवं जाव उडूमहाघयाओ' इसी प्रकार से ऊर्ध्व और अधः जो लम्बी श्रेणियां हैं वे भी अनादि अनन्त हैं । यहाँ यावत्पद से 'प्राचीप्रतीच्यायताः, दक्षिणोसरायता!' इस पाठ का संग्रह हुआ है। इस प्रकार पूर्व से पश्चिम तक जो लम्बी श्रेणियां हैं वे तथा दक्षिण से उत्तर तक की जो लम्बी श्रेणियां हैं वे अनादि अनन्त है ऐसा जानना चाहिये । વિવક્ષા કરેલ છે. તેથી લેકમાં અને અલેાકમાં જે શ્રેણિયા છે, તે ખધીનુ ગ્રહણ થઈ જાય છે. અને તે અધીના ગ્રહણથી આ શ્રેણિયા અનાદિ અને અનત છે. એવુ' જ્ઞાન થઈ જાય છે. અહીયાં ચાર ભંગે પૈકી આ એક જ लगना स्वीर थयो छे जाडीना त्रशु लगो स्वीअशया नथी. 'एव' जाव' 'उहृढमद्दाययाओं' शे” प्रभाथे पर अने नीचे ? लियो छे, ते मनाहि अने अनत छे, गडी यावत्पथी 'प्राचीनती ध्यायता, दक्षिणोत्तरायता:' પાઠને સ ગ્રહુ થયા છે. આ રીતે પૂર્વથી પશ્ચિમ સુધીની જે લાંખી શ્રેણિયેા છે, તે તથા દક્ષિણ દિશાથી ઉત્તર દિશા સુધીની જે લાખી શ્રેણિયેા છે, તે બધી અનાદિ અને અનંત છે તેમ સમજવું,
SR No.009325
Book TitleBhagwati Sutra Part 15
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1971
Total Pages972
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_bhagwati
File Size59 MB
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