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________________ - चन्द्रिका टीका शे०२० ३०५ सु०३ पञ्चप्रदेशिकस्कन्धनिरूपणम् ६५३ काथ हारिद्राथ शुक्लथेति सप्तमः । कालहारिद्रशुक्लेपु एकत्वानेकत्वाभ्यां काळमुख्यकारिद्रशुक्ल विशेषणकाः सप्तभङ्गा भवन्तीति । 'नीललोहियहालिद्दगेसु७' . एवं नीललोहितहारिद्रेष्वपि एकत्वानेकत्वनीत्या समूलकोऽपि सप्तभङ्गको भवति, तथाहि - सिय नीलए लोहियए हालिदए य१, सिय नीलए छोड़ियए - हालिगा य२, सिय नीलए लोहियगा य हालिए य३, सिय नीकए लोहिया य हालिगा य४, सिय नीलगाय लोहियए य हालिए य५, सिय नीलगाय लोहियए य हालिदगा य६, सिय नीलगाय लोहियगा य अथवा - सिय कालगाय हालिगा य सुक्किलए य ७' अनेक प्रदेश उसके कृष्णवर्ण के अनेक प्रदेश उसके पीतवर्ण के और एक प्रदेश उसका शुक्लवर्ण का हो सकता है इस प्रकार से ये भंग कृष्ण हारिद्र और शुक्ल इन वर्णों के एकत्व और अनेकत्व को लेकर हुए हैं इनमें कृष्णवर्ण को मुख्य रखा गया है और हारिद्र शुक्ल इन दो वर्णों को विशेषण रूप गौग रूप से रखा गया है । 'नील लोहियहालिएगेसु' नील लोहित हारिद्र इनमें भी इनके एकत्व और अनेhea को लेकर ७ भंग हुए हैं जो इस प्रकार से हैं - 'सिय नीलए लोहिए व हालिए य १ लिय नीलए लोहियए हालिगा य २ सिय नीलए लोहिया य हालिए य ३ सिय नीलए लोहिया य हालिदगा : सिय नीलगाय लोहियए थ हालिए य ५ लिय नीलगा य लोहियए य हालिगा य ६ सिय नीलगाय लोहिया य हालिए य ७ પાતાના અનેક પ્રદેશામાં કાળા વણુ વાળા હૈાય છે. કોઈ એક પ્રદે શમાં પીળા વણુ વાળા હાય છે તથા અનેક પ્રદેશેામાં સફેદ વણુ વાળા हाय छे. आ छट्टो लौंग छे अथवा 'लिय कालना य हालिगा य सुल्लिए T॰' અથવા કદાચ તે પેાતાના અનેક પ્રદેશામાં કાળા વધુ વાળા હાય છે, અનેક પ્રદેશામાં પીળા વઘુ વાળા ડાય છે. તથા કેાઈ એક પ્રદેશમાં ધેાળા વણુ વાળા હાય છે આ સાતમે લગ છે. છ આ રીતે આ લગે કાળાવ, પીળાવણ અને ધેાળાવણુના એકપણાને તથા અનેકપણાને લઈને અન્યા છે. આમાં કાળાવણુ તે મુખ્ય રૂપે રાખવામાં આવેલ છે. તથા પીળા વર્ણ અને સફેદવષ્ણુને વિશેષશુ રૂપે એટલે કે ગૌણ રૂપે રાખવામાં આવેલ છે. " नीललोहिय हालिइगेसु सत्त भंगा' नीसवधु, सादवार्थ, अनेधीजा વણુના ચૈાગથી પણ તેના એકપણા તથા અનેકપણાથી છ સાત ભગા थाय छे. ? था प्रमाये छे. - 'सिय नीउए लोहियए हालिए य१' सिय नीलए 'छोहियर हालिएगा य२' सिय नीलए लोहियगा य हालिए य३ सिय नीलप लोहिया य हालिहगा य४ खिय नीलगाय लोहियए य हालिए य५ सिय नीलगय लोहिया य हालिएगा य६ खिय नीलगा य लोहियगा य हाल्दिए ए७' t
SR No.009323
Book TitleBhagwati Sutra Part 13
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1969
Total Pages984
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_bhagwati
File Size63 MB
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