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________________ भगवतीसुत्रे ७०६ , माने = प्रवर्तमाने कति जनसाहरूयः कति लक्षाणि जना: 'वहियाओ' घातिता:= मारिताः ? भगवानाह - 'गोयमा ! चउरासीइं जणसयसाहस्सीओ वहियाओ ' हे गौतम ! चतुरशीतिः जनशतसाहरूयः चतुरशीतिलक्षसंख्यका जना घातिताः गौतमः पृच्छति - ' ते णं भंते । मणुया निस्सीला जाव - निपञ्चक्खाणपोसहोववासा' हे भदन्त ! ते खलु मनुष्याः निश्शीलाः यावत् निर्ब्रताः निर्गुणाः, निर्मर्यादाः, निश्शीलाः शुभभाववर्जिताः, निर्व्रताः प्राणातिपातत्रिरमणादिवतरहिताः, निर्गुणाउत्तरगुणरहिताः, निर्मर्यादा मर्यादावर्जिताः, निष्प्रत्याख्यान - पोषधोपवासाः प्रत्याख्यान- पोषधोपवासरहिता: 'रुट्ठा, परिकुविया, समरवहिया, अणुवसंता, कालमासे कालं किच्चा कहि गया कहिं उवत्रन्ना ? ' तत्र रुष्टाः = रोषमापन्नाः, परिकुपिताः क्रोधयुक्ताः, समरघातिताः = युद्धे मारिताः अत एव अनुपशान्ताः= उपशान्तभाववर्जिताः कालमासे मरणाऽवसरे कालं कृत्वा = मरणधर्ममाप्य कुत्रवहमाणे कहजणसय साहस्सीओ वहियाओ' हे भदन्त ! उस महाशिलाकंटक संग्रामके होने पर उसमें कितने लाख मनुष्योंका मरण हुआ है ? उत्तर में प्रभु उनसे कहते हैं कि 'गोयमा' हे गौतम ! 'सी' जणसवसाहस्सीओ वहियाओ' उस महाशिला कण्टकसंग्राम में ८४ लाख मनुष्य मारे गये हैं । अब गौतम प्रभुसे ऐसा पूछते हैं कि 'तेणं भंते । मणुया निस्सीला, जाव निपञ्चक्खाणपोसहोववासा' हे भदन्त ! जितने भी मनुष्य उस महाशिलाकंटकसंग्रा समें मारे गये हैं वे सब निःशील थे, यावत् प्रत्याख्यान और पोषधोपवास से रहित थे यावत् पदसे निर्व्रत वे प्राणातिपात विरमण आदितसे रहित थे, निर्गुण- उत्तरगुणोंसे रहित थे, निर्मर्याद मर्यादा से रहित थे 'रुट्ठा, परिकुविया, समरवहिया, अणुवसंता, कालमासे वहियाओ ?' डे महन्त । ते महाशिलाई 28 सग्राम थयो, त्यारे डेटा साथ માણસાના તેમાં સંહાર થયેા હતા? भडावीर अभुने। उत्तर- 'चउरासीइं जणसयसाहस्सीओ वहियाओ' हे गौतम! તે સંગ્રામમા ૮૪ લાખ મનુષ્ચા માર્યાં ગયા હતા. गौतभ स्वाभाने। प्रश्न- ‘तेणं भंते ! मणुया निस्सीला, जाव निपच्चकवाणपोसहोवनासा' डे अन्त! ते सममां ने मनुष्यो भार्या गया तेयो निःशीस, નિવૃત (પ્રાણાતિપાત વિરમણુ આદિ તેથી રહિત), નિ`ણુ (ઉત્તર ગુણેાથી રહિત), भर्याद्वाथ रडित, प्रत्याख्यान अने घोषधोपवासेोथी रहित हुता रुट्ठा, परिकुविया, समरवहिया, अणुवसंता, कालमासे कालं किच्चा कहिं गया, कहिं उववन्ना?"
SR No.009315
Book TitleBhagwati Sutra Part 05
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1963
Total Pages880
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_bhagwati
File Size50 MB
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