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________________ प्रमेयचन्द्रिका टीका श.७ उ. ९ म. २ महाशिलाकण्टकसंग्रामनिरूपणम् ६९९ 'तएणं से कूणिए राया हारोत्थयमुकयरइयवच्छे' ततः खलु स कुणिको राजा हारावस्तृतमुकृतरतिदवक्षाः हारावस्तृतेन हारावच्छादनेन सुष्टु कृतं रतिद-मनोहरं वक्षः वक्षस्थल यस्य स तथा 'जहा उववाइए जाव सेयवरचामराहिं उडुबमाणीहि उधुन्चमाणीहिं' यथा-औपपातिके सूत्रे प्रतिपादनं कृतम् तदनुसारं यावत् श्वेतवरचामरैः उद्धयमानैः उडूयमानः पुनः पुनः वीज्यमानैः इत्यर्थः 'हय-गय-रह-पवरजोहकलियाए चाउरंगिणीए सेणाए सद्धि संपरिघुढे' हय-गज-स्थ-प्रवर-योध-कलितया चतुरङ्गिण्या सेनया साईसह संपरिसृतः संवेष्टितः 'महयाभडचडगरविंदपरिक्खित्ते' महाभटचडगरवृन्दपरिक्षिप्तः महाभटानां चडगरन्देन विस्तारवत्सङ्ग्रेन परिक्षिप्त परिसृतः 'जेणेव महासिलाकंटए संगामे तेणेव उवागच्छड' यचैव यस्मिन्नेव प्रदेशे महाशिलाकण्टकः संग्रामः तत्रैव तस्मिन् एव प्रदेशे उपागच्छति 'उवागच्छित्ता महासिलाकटयं संगाम ओयाए' उपागम्य महाशिलाकण्टकं संग्रामं युद्धगये । 'तएणं से कूणिए राया हारोत्थयस्तुकयरइयवच्छे' पहिरे हुए हार से उनका वक्षस्थल बडा हो मनोहर-सुहावना-दिख रहा था. औपपातिक सूत्र में जैसा वर्णन किया गया है उसी के अनुसार यावत् पुनः पुनः वीज्यभान श्वेत चामरो से घिरे हुए होकर वे कूणिक राजा 'हय-गय-रह पवर जोह कलियाए चाउरंगिणीए, लेणाए सद्धिं संपरिवुडे' घोडा, हाथी, रथ एवं श्रेष्ठ योद्धाओं से युक्त चतुरंगिणी सेना के साथ२ 'महया अडचडगरविंदपरिक्खित्ते' तथा विस्तृत महाभटोके समूह के साथ२ 'जेणेव महासिलाकंटए संगामे तेणेव उवागच्छइ' जहाँ महाशिलाकपटक संग्राम था उस स्थान पर गये। 'उवागच्छित्ता' वहां आकर वे 'महासिलाकटयं संगामं ओयाए' गयो', त्या सुधीनु पणुन मी ५ अडएर ४२७ 'तएणं से कुणिए राया हारोत्थयसुकयरइयवच्छे, ते वमते धारण रेस हारने सीधे तमर्नु पक्षस्था ઘણું મહર અને સુંદર લાગતુ હતુ ઔપપાતિક સૂત્રમાં જેવું વર્ણન કરવામાં આવ્યું છે તે વર્ણન અહી પણ ગ્રહણ કરવું (યાવત્ ) શ્વેત ચામરેથી જેમના उ५२ वायु द्वारा २वी तो, 'हय-गय-रह-पवरजोहकलियाए चाउरंगिणीए सेणाए सद्धिं सपरिखुडे' मेवा 3 Plot st, साथी, २थ मने श्रेष्ठ योद्धामाथी युत सेवा यतु सेना साथे महया भड-चडगरविंदपरिक्खित्ते ' मन भ। सुभटोन। विशाल समूड साथ 'जेणेव महासिलाक टए सगामे तेणेव उवागच्छड, महाशिबाट४ सयाम थवानी ते!, ते स्थाने गया.
SR No.009315
Book TitleBhagwati Sutra Part 05
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1963
Total Pages880
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_bhagwati
File Size50 MB
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