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________________ १०६ भगवतीमत्रे यावत्करणात-सूर्यः, ग्रहगणः, नक्षत्रम्' इति संग्रायम्, भगवानाह-'णो इणद्वे समट्टे हे गौतम ! नायमर्थः समर्थः रत्नप्रभायाः मध्ये चन्द्रादयो नैव संभवन्ति । गौतमः पृच्छति-'अस्थिणं भते ! इमीसे रयणप्पभाग पुढवीए चंदामा इवा, सरा मा इदा ?' हे भदन्त ! अस्ति संभवति रवलु अम्यां रत्नप्रभायां पृथिव्यां चन्द्रामा चन्द्रप्रकाशः इति वा, मूर्याभा मर्यप्रकाशः इति वा ? भगवानाह-'णो इणढे समढे' हे गौतम ! नायमर्थ ममर्थः, रत्नप्रभायां चन्द्रामा सूर्याभा च नैव संभवतः, 'एवं दोचाए पदवीए भाणियव्यं' एवं रत्नप्रभावदेव द्वितीयायामपि शर्कराप्रभायां पृथिव्यां गेहादिमरूपणं भणितव्यम् वक्तव्यम्, 'एव तच्चाए वि भाणियन्वं' एव रत्नप्रभावदेव तृतीयायामपि वालुकाप्रमायां पृथिव्यां गेहादि 'अहे' पदका प्रयोग आ रहा है वह इसलिये आ रहा है कि अधोलोक के नीचे है। यहां यावत्पदसे 'स्न्ये, ग्रहगणं, नक्षत्र' इनका ब्रहण टुआ है । इसके उत्तर में पशु उनसे कहते हैं कि 'णो इणटेसमटे हे गौतम ! यह अर्थ समर्थ नहीं है अर्थात् रत्नप्रभा के बीचमें चन्द्रादिक नहीं पूछते है-'अत्थि णं मते ! इमीसे रयणप्पभाएपुढबीए चंदाभाइ वा, सग भाइ वा' हे भदन्न ! इस रत्नप्रभा पृथिवीमें चन्द्रप्रभा चन्द्रप्रकाशा और सूर्यप्रभा-सूर्य प्रकाश दोनों है क्या ? उनके उत्तर में प्रभु कहते है ‘णो इणद्वे समटे' हे गौतम ! यह अर्थ समर्थ नहीं है अर्थात् रत्नप्रभा में न चन्द्रप्रकाश है और न सूर्य प्रकाश है। एवं दोचाए पुढबीए भाणियव्वं' इसी गकारले अर्थात् रत्नप्रभा पृथिवीके समान ही द्वितीय शर्करापृथिवी में भी गेहादिकोंकी मरूपणा कर लेनी चाहिये । एवं तच्चाए वि भाणियन्वं' इसी तरहसे तृतीय वालुका प्रभामें भी गेहादिकोंकी प्ररूपणा करलेनी (અહી સૂત્રમાં જે “અરે પદને પ્રયોગ થયો છે તેનું કારણ એ છે કે રત્નપ્રભા પૃથ્વી અલેકની નીચે છે) तना उत्तर भापता महावीर प्रभु ४९ छ-'णो इणने समद्रे' गीतम! રત્નપ્રભા પૃથ્વીમા ચન્દ્રાદિનો સદ્ભાવ નથી गौतम स्वामीना प्रश्न- 'अत्थिणं भंते! इमीसे रयणप्पभाए पुढवीए चंदाभाड वा, सराभाइ वा ? महन्त ! मा २त्नमा वीमा यन् भने सूर्यना अाशने शु समाव छ ? उत्त२-'णी इण२ समते, हे गौतम ! २ सीमा ચન્દ્રને પ્રકાશ પણ સંભવિત નથી અને સૂર્યનો પ્રકાશ પણ સ ભવિત નથી. 'एवं दोच्चाए पुदवीए भाणियवं' २त्नप्रसा पृथ्वीना विषयमा मा सत्रभावी પ્રરૂપણ કરવામાં આવી છે, એવી જ પ્રરૂપણા શર્કરા પૃથ્વી નામની બીજી પૃથ્વીના विषयमा ५ समावी एवं तच्चाए वि भाणियन्वं' मा प्रभार
SR No.009315
Book TitleBhagwati Sutra Part 05
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1963
Total Pages880
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_bhagwati
File Size50 MB
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