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________________ ४६४ सूत्रकारको ___ अन्वयार्थः-(अणुगच्छमाणे) अनुगच्छन सत्या सन्याम्पेनि भाषाहिकमा. श्रित्य उपदेशं कुर्वतो मुनेर्वचनमनुपरन् कश्चिद् मन्दाधिकारी 'वितहः वित विपरीतमेव अन्यथैव (विजाणे) विजानीयात्, त सम्रागर्थ मनन गरम मन्दाधि. कारिणम् 'तहा तहा' तथा तपा-तेन तेन प्रकारेग हेतु दृष्टान्तादिकथनप्रकारेण (साहु) साधुः (अरसेणं) अर्कशे न कोमलवचनेन उपदिगे येन स सम्यग वगच्छेद मूखोऽयमितिकृत्वा तं नापमानयेन (ण कत्थइ भाम) न कत्थये भापाम् अधिकारीको 'तहा तहा-या तथा' उस उस प्रकारने हेतुदृष्टात आदि शन प्रकार से 'मास साधुः' नाधु 'अमरकणं-असर्कशेन' कोमल बचन से उपदेशकरे 'ण शास्थाइ भाड-न फत्ययेत् मापाम्' नेत्र भंग के विकारले प्रश्न कर्नाके पनमें कुछ भी पीडा उत्पन्न न करे तथा 'ण विहिसइज्जा-न विहिरयात्' उसका निरस्कार भी न करे तथा 'निझाद्वगंवाधि-निरूद्ववापि अल्पाको 'ण दीहा -नदीघद्र' दीर्घ. शाक्यले कथन न करे ॥२३॥ ____ अन्वयार्थ-सत्या मृषा 'जो सत्य है और अट नहीं है' रूप द्वितीय भाषा व्यवहार हारा उपदेश करने वाले मुनि के वचन का अनुमरण करता हुआ जो कोई सन्द अधिकारी पुरुप वितथ याने असत्य को विपरीत ही समझने लगता है। उस सम्यक् अर्थ को नहीं जानने वाले मन्दाधिकारी को उस उस तरीक्षा से हेतु दृष्टान्तादि कथन पूर्वक कोमल वचन द्वारा साधु उपदेश करे जिससे वह मन्दाधिकारी उसको सम्यग्रूप से समझ जाय 'यह मूर्ख है' ऐसा समझ कर उसको अपतत प्रारथी-केतु धात विरेन। ४५न प्राथी 'साहु-साधुः' साधु 'अक कसेण-अकर्कशेन' म क्य था ५॥ ४२ ‘ण कथइ-भास-न कत्थयेत् મામ્' નેત્ર સંકેતના વિકારથી પ્રશ્નíના મનમાં કંઈ પણ પીઠા ઉત્પન્ન न ४२ तथा 'ण विहिसइज्जा-न विहिस्यात' तेना ति२२४।२ ५ न ४२ तथा 'निरुद्धग वाषि-निरुद्धवापि' ८५२ 'ण दीहइज्जा-न दीर्घयेत' समापूर्व કથન ન કરે ૨૩ અન્વયાર્થ–સત્યામૃષા (જે સત્ય છે અને જુઠું નથી) રૂપ બીજી વ્યવહાર ભાષા દ્વારા ઉપદેશ કરવાવાળા મુનિના વચનનું અનુસરણ કરતા થકા જે કઈ મંદ અધિકારી પુરૂષ વિતથ અર્થાત્ અસત્યને વિપરીત જ સમજે છે, એ સમ્યક્ અર્થને ન જાણવાવાળા મંદાધિકારીને એ તરકીબથી હેતુ દૃષ્ટાંત વિગેરે કથન પૂર્વક કેમલ વચન દ્વારા સાધુ ઉપદેશ કરે. જેથી એ મંદાધિકારી તેને સમ્યફ પ્રકારથી સમજી જાય “આ મૂર્ખ છે એવું સમજીને તેને
SR No.009305
Book TitleSutrakrutanga Sutram Part 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1970
Total Pages596
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_sutrakritang
File Size33 MB
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