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________________ [ ७६ ] व्रतके फलको ध्यानपूर्वक सुनने की प्रेरणा करते हुए कहते हैं कि-'इस व्रतकं फलश्रवणसे देहधारियोंके सव पाप प्रलयको प्राप्त हो जाते हैं ! यहाँ 'साहाः' पदमें प्रयुक्त हुए 'सर्व' शब्द की मर्यादा 'सर्वज्ञ' शब्दमें प्रयुक्त हुए 'सर्व' शब्दको मर्यादासे कुछ कम नहीं है वह जैसे त्रिकालवर्ती अशेष पदार्थोंको विषय करने वाला कहा जाता है वैसेहो यह 'सर्व' शब्दभी भूत-भविष्यत्-वर्तमानकाल सम्बन्धी सब प्रकारके संपूर्ण पापों को अपना विषय करने वाला समझना चाहिये। उन सब पापोंका इस फलश्रवण से उपशम या क्षयोपशम होना नहीं कहा गया बल्कि एकदम प्रलय (क्षय) होजाना बतलाया गया है और इसलिये इस कथनका साफ़ फलितार्थ यह निकलता है कि ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनोय, अन्तराय, असातावेदनीय अशुभ नाम, अशुभ आयु, और अशुभ गोत्र नामकी जो भी पापप्रकृतियाँ हैं वे सब इस व्रतके फलश्रवण. मात्रसे क्षयको प्राप्त हो जाती हैं ! फिर तो मुक्तिको उसी जन्म में गारण्टी अथवा रजिस्टरी समझिये ! पाठकजन ! देखा, कितना सस्ता और सरल यह उपाय भगवानने सब पापोंसे छूटने और मुक्तिको प्राप्तिका बतलाया है !! पाप-क्षयका इससे अधिक सुगम उपाय आपको अन्यत्र कहींसे भी देखने को नहीं मिला होगा। इस गुह्य रहस्यका ग्रंथकार परही अवतार भगवानकी खास मेहरबानीका फल जान पड़ता है !!! अच्छा होता, यदि भगवान दि० तेरहपंथियों और दूढियोंको इस व्रतका फल पहलेही सुना देते, जिससे वे बेचारे सर्व पापोंसे मुक्त हो जाते और फिर भगवान् को उनके साथ लड़ने झगड़ने तथा उनपर गालियोंकी वर्षा करने की ज़रूरतही न रहती! शायद कोई तार्किक महाशय यहां यह कह बैठे कि चूंकि भगवान्को ख़ास तौरसे अपने अभिषेक
SR No.009241
Book TitleSuryapraksh Pariksha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir
Publication Year1934
Total Pages178
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size6 MB
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