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________________ [ ४१ } पाँच नामोका बखान कर कुन्दकुन्दका स्तवन करने लगे। इस कथनके सूचक वाक्य इस प्रकार हैं: अश्मजा वादिता येन भंगमाप्ताः खलाशयाः । स्वेतवासोधराः कुराः तस्मै श्रीमुनये नमः ॥४५४॥ सीमंधराजिनेन्द्रस्य येनाप्तं दर्शनं शभम् । प्राचीनपुण्ययुक्तेन तस्य पादों नमाम्यहम् ॥४५५॥ अस्मिन् कलो मुनीन्द्रेण तेनैव रचना कृता । शास्त्रादीनामहो भव्याः तस्मै नमोस्तु सर्वदा ॥४५६॥ कुन्दकुन्दसमश्वास्मिन् काले मिथ्यात्वसंभृते । नाभून्नैव पुनथात्र भविष्यति सुनिश्चयात् ॥४५७॥ धन्या सा जननी लोके यस्याः कुक्षौ सुरैः स्तुतः । अभूदै ईदृशः पुत्रो मिथ्यान्धतमः पूषणः ॥४५८॥ कुन्दकुन्दमुनीन्द्रस्य तस्यैवाहं करोमि वै । स्तवनं चित्तरोधार्थ नित्याहसो विनाशकम् ॥४५६॥ इसके बाद कुन्दकुन्दके स्तवनका माहात्म्य बतला कर भगवान ने कहा कि-"इस तरह धर्ममार्गको प्रकट करनेके पश्चात् कुन्दकुन्दने अपनी आयुका एक महीना अवशिष्ट जान कर समाधि-सिद्धिके लिये अपने नगरके वाह्यस्थ वन गमन किया और वहां क्रमशः सर्व आहारका त्याग कर, मंत्रराजका श्रवण-स्मरण और पंचपरमेष्ठी तथा सोमधर स्वामोका ध्यान करते हुए, समाधिपूर्वक प्राण त्यागकर स्वर्ग प्राप्त किया। चौथे कालमें घे मोक्ष जायंगे।" और इसके अनन्तरही वे कुन्दकुन्दके गुणोंका तथा उनके पुण्यका पुनः कीर्तन करने लगे और यहां तक कह गये कि 'वे यतिराट् हमारो और तुम्हारो सदा रक्षा
SR No.009241
Book TitleSuryapraksh Pariksha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir
Publication Year1934
Total Pages178
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size6 MB
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