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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir १२२ पुंक्खलवई विजये जयो रे, नयरी पुंडरीगिणी सार; श्री सीमंधर साहिबा रे; राय श्रेयांस कुमार. जिणंदराय ! धरजो धर्म सनेह १ न्हाना मोटा अन्तरो रे, गिरुआ नवि दाखंत; शशि-दरिसण सायर वधे रे, कैरववन विकसंत. जिणंद० २ ठाम कुठाम न लेखवे रे, जग वरसंत जलधार; कर दोय कुसुमे वासोये रे, छाया सवि आधार. जिणंद. ३ राय ने रंक सरीखा गणे रे, उद्योते शशी सूर; गंगाजल ते बिहुंतणा रे, ताप करे सवि दूर. जिणंद० ४ सरीखा सहुने तारवा रे, तिम तुमे छो महाराज; मुजशु अंतर केम करो रे, बाह्य ग्रह्यानी लाज. जिणंद० ५ मुख देखी टीलु करे रे, ते नवि होय प्रमाण; मुजरो माने सवि तणो रे, साहिब ते सुजाण, जिणंद० ६ वृषभ लंछन माता सत्यकी रे, नंदन ऋक्ष्मणि कंत; वाचक यश इम विनवे रे, भय भंजन भगवंत. जिणंद० ७ (प्रभु ! तुज शासन अति भल) 'पुक्खलवइ' विजये जयो, श्री 'सीमंधरस्वामी' रेः विहरमान प्रभु प्रह समे, प्रणमुं हुं शिर नामी रे. पुक्खल०१ नयरी पुंडरीगिणी' राजीयो, 'श्रेयांस' नृप-कुल-चंदो रे; 'सत्यकी' नंदन सुंदरु, भवियण नयननंदो रे. पुक्खल०२ धन्य जना ते विदेहना, सफल जन्म तस जाणुं रे; पुण्य प्रबल जग तेहy, जीवित तास वखाणु रे. पुक्खल०३. For Private And Personal Use Only
SR No.008679
Book TitleUd Jare Panchi Mahavideh Mai
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDharnendrasagar
PublisherSimandharswami Jain Mandir Khatu Mehsana
Publication Year
Total Pages263
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Spiritual
File Size10 MB
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