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दे० चो० बा०
अहितनो त्याग करे, तथा हितने आदरे तेहथी संयम तपनी शोध केतां शुभता धाय ।।४।।
अभिनव कर्म अग्रहणता, जीर्णकर्म अभावो जी ॥ निःकर्मीने अवाधता,
अवेदन अनाकुल भावो जी ॥चो०॥ ५॥
अर्थ:--संयम तपनी शुद्धता थवाथी नवां कर्मनी अग्रहणता थाय. एरले नवां कर्म न बांधे, अने जीर्ण केतां जूनां कर्मनो अभाव थाय, एठले पूर्वबंध सत्तागत कर्म निर्जरे अने नवानो बंद नहीं थाय, तथा मूलगां सत्तागत क्षय जाय तेवारे आत्मा निःकमी केतां सर्वकर्मरहित थाय, अबाधता केतां बाधा रहिल थाय, जे बाधा ते आत्मप्रदेशे पुद्गलना संगनी छे, युगलसंग ले, बाधा मटी गइ, तेवारें आत्मा अवेदन अनाकुलपणुं पास्यो ने आकुलता परोपाधिनी हती ते गइ ते सर्वप्रभुभक्तिनो उपगार जाणवो ते माटे चोवीशे जिनने स्तवीएं एहीज सार छे ॥ ५॥ इति पंचम गाथार्थः ॥
भावरोगना विमगथी, अचल अक्षय निराबाधो जी ॥ पूर्णानंददशा लही, विलसे सिद्ध समाधा जी ॥ चा० ॥६॥ अर्थ:--पछी भाव ले पराशयापीपणु तेहनो विगम
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