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________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir परिग्रहममता. राग उपरनो. परिग्रहनी मूर्छा छे भारी, मोह्यां नरने नारीरे परिग्रह ग्रहछे अभिनव जगमां, आपे दुःखडां भारीरे. परिग्रह. ? सर्व उपाधि मूळ परिग्रह, नरकगतिनी क्यारीरे; परिग्रह मोघे धर्म न मुझे, जोशो दिल विचारीरे. परिग्रह. २ परिग्रह सन्निपात समो छे, चिंता दुःख संचारीरे; बाह्य भावमां मनडुं भटके, जावे नरभव हारीरे परिग्रह. ३ अन्तर्धनमां विघ्न परिग्रह, जोशो मनमा धारीरे; ज्ञान ध्याननो भंग करे छे, चेतन शक्ति खुवारीरे. परिग्रह. ४ परिग्रहमां मोटाइ धारे, भूल्या ते जन भारीरे । बुद्धिसागर अन्तर्धनथी, चिदानंद तैयारीरे. परिग्रह. ५ शामाटे वाद करवो, उठो चेतन आळस छंडी-ए राग शा माटे अरे वाद करो छो, वादे सत्य न सुझरे; धर्मवाद वण ताणताणा; आतम तत्त्व न बुझेरे. शा माटे. १ सातनयोनुं ज्ञान थया वण, सापेक्षा नहि आवेरे; सापेक्षा समज्या वण चेतन, स्थिरताभाव न पावेरे. शा माटे. २ स्याद्वाद सम्यक् जे समजे, ज्ञानी तेह कहावरे सद्गुण दृष्टि मनमा धारी, परमानंदपद पावरे. सा माटे. ३ इष्टानिष्टपणुं नहि परमां, समता सहज कहावरे, For Private And Personal Use Only
SR No.008539
Book TitleBhajanpad Sangraha Part 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBuddhisagar
PublisherAdhyatma Gyan Prasarak Mandal
Publication Year1909
Total Pages308
LanguageGujarati, Sanskrit
ClassificationBook_Gujarati & Worship
File Size12 MB
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