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रह्यो हुँ शांतरस झीली, रह्यो हुं शांतरस खाली बुद्धयन्धि तत्त्वमा रंगी, थशो सहु जीव सत्संगी. ॥ ८ ॥
आत्माना दयाना उद्गार.
गजल.
दयामय दृष्टिथी देखें, दयामय दृष्टिथी पे दयामय देश छे म्हारो, दयामय देश छे प्यारो. ॥१॥ दयामय मेघ छे वृष्टि, खीले छे धर्मनी सृष्टिः दयामय चित्त गंगा छे, दयामय चित्त चंगा छे. ॥२॥ दयामय तीर्थ चेतन छे, दयामय धन्य ते मन छे; दयामय दील छे देवा, दयामय दीलनी सेवा. ॥३॥ दयाथी सुखने शान्ति, दयाथी जाय छे भ्रांति दया त्यां धर्मनो वासो, दयानो रंग छे खासो. ॥४॥ दयाना संगमां रहे, दयाथी तत्वने कहेवू दयाथी बोलवू सारूं, दयाथी बोलवू प्यारं. दयाथी सर्व धर्मो छे, दयामां धर्म कर्मों छे; दयाने प्रेम लावे छे, दयाथी सुख थावे छे. दयाथी धर्म प्रगटे छे, दयाथी कर्म विघटे छे; बुद्धयब्धि चित्तमां प्यारी, दया माता सदा सारी. ॥७॥
सूती वखते आत्मोद्गार.
धीराना पदनो राग. शरीरनो तुं संगी रे, आतम अवधारजे, शुद्धरुप समजी रे, विषयविष वारजे शरीर० नाना मोटा वृद्ध युवा नर, नारीना पर्याय;
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