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________________ भक्तामर प्रवचन काव्य-२३ जो दुनिया के दुःख से दुःखी हो, रागी हो, वह परमात्मा नहीं है। जो दुनिया के लिए अवतार ले, वह भगवान नहीं है। जो तीनलोक का ज्ञाता-दृष्टा रहे एवं पूर्ण आनन्द का अनुभव करे, वही भगवान है। वीतरागी पर में सावधानी रखें - ऐसा नहीं होता । जीवों को दुःखी देखकर, उनकी सहायता करने का विकल्प भी जिनेन्द्रभगवान को नहीं होता। मोह से दूर रहनेवाले १८ दोषों से रहित ही देव कहलाते हैं। आप तीनों काल के ज्ञाता हैं, इसलिए आपने कहा- 'मैं जिसतरह पूर्ण हो गया, उसीतरह तुम भी पूर्ण होने योग्य हो।' आप किसी भी विकार से परेशान नहीं हैं। आपको अब कोई भव धारण नहीं करना है। वीतरागदेव का वास्तविक स्वरूप समझे बिना साध्य का स्वरूप नहीं समझा जा सकता। सर्वज्ञदेव ज्ञानी को निमित्त होते हैं । ज्ञानी उन्हें परमपुरुष मानता है। दिगम्बर मुनि छठे-सातवें गुणस्थान की भूमिका में झूलते हैं। वे आपको ही आराध्यपने स्वीकारते हैं, वे कहते हैं कि - "हे नाथ! आपकी पूर्णशक्ति, अनंतज्ञान, आनन्दमय है; उस शक्ति में से ही आपका विकास हुआ है। मुझे भी उसी उपाय का ही आदर है, यही वास्तविक मृत्युञ्जय जाप है। अज्ञानी जीव अन्य नानाप्रकार के मृत्युञ्जय जाप जपते हैं। एक जमींदार के शरीर में वेदना हुई तो मृत्युञ्जय का जाप जपा गया, किन्तु वह अन्त में चीख मारते हुए मर गया; उसका अधिकार, राज्य, पैसा उसे नहीं बचा सके। हे नाथ! मैंने सम्यग्ज्ञान द्वारा आपकी शरण ली है तो मेरा बेड़ा पार होने ही वाला है। हे नाथ ! आप (सर्वज्ञ परमात्मा) की वाणी पात्र जीवों को मोक्षमार्ग में निमित्त है। योग्य जीव ही सच्चे मृत्युञ्जय का जाप जपते हैं। ज्ञानानंद स्वभाव का भान करनेवाला ही मृत्यु को जीतता है। यह सभी कहते हैं कि हमारे अरहंत देव तीनकाल को जानते हैं; किन्तु क्या उन्हें केवलज्ञान के स्वरूप की खबर है? जो-जो देखी वीतराग ने सो-सो होसी वीरा रे। अनहोनी कबहूँ नहीं होसी, काहे होत अधीरा रे ।। सर्वज्ञभगवान-परमात्मा के पूर्ण ज्ञान प्रकट हुआ है, ऐसे अनन्तज्ञानी हो गये हैं। उनका स्वरूप जानकर अन्तर में अपने पूर्ण-स्वरूप की पहिचान करे तो सर्वज्ञ की श्रद्धा अपनी शान्ति में निमित्त होती है। मात्र ‘णमो अरहन्ताणं' जपने की बात नहीं है। जैनों में 'अरहते सरणं पव्वज्जामि' रूढ़ि से बोला जाता है, किन्तु क्या वीतराग भगवान शरण देते हैं, क्या उनके पास आज तक किसी को शरण मिली है? नहीं, नहीं मिली । यह तो विनय से बोलने का व्यवहार है। उन्होंने तो आत्मा की पूर्ण शक्ति का ज्ञान कराया है। तुझे तेरी आत्मा का यथार्थ ज्ञान हो तो अरहन्त का ज्ञान हुआ कहलायेगा । हे नाथ! आप स्वयं मृत्यु को जीतकर अमर हुए और जगत को अमरता का संदेश दिया। शिव अर्थात् उपद्रव रहित कल्याणकारी मार्ग का अन्य कोई रास्ता नहीं है। निश्चय से प्रत्येक आत्मा पूर्ण शक्तिमान परमात्मा है। जो उसका विचार कर अन्तर में सावधान हो तो उसकी मृत्यु नहीं हो और वह मोक्षदशा को प्राप्त करे, इसके सिवाय अन्य कोई मोक्ष का मार्ग नहीं है। सांख्य मतवाले आत्मा को पूर्णतः निर्मल एवं अपरिणामी मानते हैं; किन्तु यदि ऐसा हो तो फिर अवतार अर्थात् जन्म नहीं होना चाहिए। जो आत्मा को सर्वथा शुद्ध माने और संसार रागादि को जड़कर्म द्वारा किया जाने वाला कहे - यह बात यथार्थ नहीं है। ___हे भगवान! आप परमपुरुष हो । पुरुष उसे कहते हैं, जो अपने गुण में रहे, जो अपने ज्ञान और आनन्द में रमे वह पुरुष है - ऐसा 'पुरुषार्थसिद्धयुपाय ग्रन्थ में कहा है। हे भगवन् ! आप परमपुरुषार्थ द्वारा अपने स्वभाव को जानकर कृतकृत्य होते हुए आत्मा के परमशांत रस में लीन हैं। सम्यग्दृष्टि अपनी श्रद्धा अपेक्षा कृत-कृत्य होकर अपने गुण में आंशिक रूप से लीन होता है, इसलिए अविरतसम्यग्दृष्टि भी सत्पुरुष है। जो पुण्य-पाप में रुचि ले और उनसे आत्मा का लाभ माने, वह तो पुरुष ही नहीं है। जैसे नपुंसक के पुत्र नहीं होता, वैसे ही पुण्य से आत्मकल्याण नहीं हो सकता है। धर्म का जन्म तो धर्मी आत्मा से ही होता है, इसलिए पुण्य से धर्म माननेवाले के अंशमात्र भी धर्म नहीं होता है। सन्तों ने इस कटु सत्य को सर्वत्र डंके की चोट प्रकट किया है।
SR No.008342
Book TitleBhaktamara Pravachan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRatanchand Bharilla
PublisherTodarmal Granthamala Jaipur
Publication Year2006
Total Pages80
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Discourse
File Size385 KB
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