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________________ [.] મંગલ જ્ઞાન દર્પણ ભાગ-૧ सद्भूत व्यवहारनयका उदाहरण नहीं बतलाया है सो इसका कारण है। [पृष्ठ-२३१] आलोक सहित त्रिलोकवर्ती और त्रिकालवर्ती समस्त पदार्थ केवलज्ञानमें ऐसे ही प्रतिभासित होते है जैसे दर्पणके सामने आया हुआ कोई पदार्थ उसमें प्रतिबिम्बित होता है। यद्यपि दर्पण अपने स्थानमें रहता है और प्रतिबिम्बित होनेवाला पदार्थ अपने स्थानमें रहता है। न तो दर्पण पदार्थ में जाता है और न पदार्थ दर्पणमें आता है। फिरभी सहज ऐसा निमित्त नैमितिक सम्बन्ध है कि पदार्थ के दर्पण के सामने आने पर स्वभावसे दर्पणमें वह स्वयं प्रतिबिम्बित होने लगता है। उसी प्रकार केवलज्ञानका स्वभाव सब द्रव्यों और उनकी सब पर्यायोंको जाननेका है। दर्पणके समान यहां पर भी न तो सब पदार्थ केवलज्ञानमें आते है और न केवलज्ञान सब पदार्थों में जाता है। फिरभी पदार्थ और केवलज्ञानका ऐसा ज्ञेय-ज्ञायक सम्बन्ध है। [पृष्ठ-२८८] वह प्रतिबिम्ब युक्त दर्पणके सामने सब पदार्थों के आकार [ प्रतिभासको] लिए हुए ही होती है, इसलिए प्रत्येक समयमें उस पर्यायका ज्ञान होनेसे व्यवहारसे यह कहा जाता है कि केवलज्ञान प्रत्येक समयमें सब द्रव्यों और उनकी त्रिकालवर्ती सब पर्यायोंको युगपत् जानता है। ज्ञानमें स्वाभाविक ऐसी अपूर्व सामर्थ्य है इसका भान तो हम छदमस्थोंको भी होता है। इससे सिध्ध है कि ज्ञानमात्रका यह स्वभाव है कि वह अपने स्थानमें रहते हुए भी अपनेमें प्रतिभासित होनेवाले सब पदार्थों को जाने। जब सामान्य ज्ञानकी यह सामर्थ्य है तब जो केवलज्ञान अशेष प्रतिबन्धक कारणोंका अभाव होकर प्रगट हुआ है उसमें ऐसी सामर्थ्य हो इसमें आश्चर्यकी बात ही कौन सी है। केवलज्ञान एक दर्पणके समान है। जिस प्रकार दर्पणके सामने जितने पदार्थ स्थित होते हैं वे सब अखंडभावसे उसमें प्रतिबिम्बित होते हैं। वे वर्तमानमें जैसे हैं वैसे प्रतिबिम्बित होते ही हैं। साथ ही वे अपनी अतीत और अनागत शक्तिको अपने गर्भमें समाये रहने के कारण उस सहित प्रतिबिम्बित होते है। दर्पणका ऐसा स्वभाव ही है कि वह अपने सामने आये हुए पदार्थके आकारको ग्रहण कर तद्रूप परिणम जाय। ठीक यही अवस्था केवलज्ञानकी है। अलोक सहित लोकमें स्थित जितने पदार्थ है वे अपनी अपनी वर्तमान पर्यायके साथ उसमें प्रतिभासित तो होता ही हैं। साथ ही वे अतीत और अनागत शक्ति समुच्चयको अपने गर्भमें समाये रहनेके कारण उस सहित प्रतिभासित होते हैं। आचार्य कुन्दकुन्दने ज्ञानको ज्ञेयगत और ज्ञेयको ज्ञानगत कहकर जो उसकी व्यापकता सिध्ध की है सो उसका कारण भी यही हैं। इसका यह अर्थ नहीं कि केवलज्ञान अनन्त ज्ञेयोंमें जाता है और अनन्त ज्ञेयो
SR No.008263
Book TitleMangal gyan darpan Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShobhnaben J Shah
PublisherDigambar Jain Kundamrut Kahan
Publication Year2005
Total Pages469
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati, Education, & Religion
File Size3 MB
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