SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 186
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ हैदराबाद जिला । [ १६५ कुछ दूर जाकर हरएक बगलके कमरेसे एक छोटे कमरेमें पहुंचना होता है जहां सब तरफ जैन तीर्थंकरोंकी मूर्तियां कोरी हुई हैं । ये कमरे बगलके कमरोंके वरामदेके अन्तमें हैं। पूर्व ओर वरामदेमें दो खंभे सामने व दो पीछे हैं। द्वारके सामने दक्षिण तरफ अंबिका देवी है । दाहनी तरफ इंद्र हैं । बाएं हाथमें एक थैली व दाहनेमें नारियल है। ये मुख्य जैन मूर्तियोंके सामने हैं। कमरा २५ फुटसे २३॥ फुट है। छतका आधार ४ चौकोर खंभोंसे है। जिसमें गोल गुम्बज हैं। इसमें दाहनी तरफ श्री गोम्मटस्वामीकी मूर्ति है जो दिगम्बर जैनोंको बहुत प्यारी है, कनड़ा देशमें ऐसी कई बड़े२ आकारकी मूर्तियां स्थापित हैं। बाईं तरफ भी श्री पार्श्वनाथ भगवानकी नग्न मूर्ति चमरेन्द्र सहित है। छोटी वेदियोंमें पद्मासन श्री महावीरस्वामीकी मूर्तियें हैं। कमरेकी हर तरफकी भीतोंके सहारे बहुतसी नग्न जैन मूर्तियां हैं व बीचमें इधरउधर बहुतसी छोटी२ मूर्तियां हैं। भीतर सिंहासनपर पद्मासन श्री महावीर स्वामी विराजमान हैं। इस बड़े कमरेके दक्षिण पश्चिम कोनेमें दूसरा द्वार है जिस पर चार हाथकी देवी दाहनी तरफ है व नीचे वाई तरफ एक मोड़पर आठ हाथवाली देवी सरस्वती है। एक छोटे कमरेसे होकर कुछ कदम चलकर हम एक वरामदेमें आते हैं फिर एक छोटे कमरेमें जैसा पहले कह चुके हैं यहां भी अंबिका दाहनी ओर है और उसके सामने चार हाथकी देवी है, जिसके उठे हुए हाथोंमें दो गोल फूल हैं और जो हाथ घुटनेपर है उसमें वज्र है । वरामदेके पश्चिम ओर द्वारके सामने इन्द्रकी मूर्ति है । भीतर वेदीके
SR No.007291
Book TitleMumbai Prant ke Prachin Jain Smarak
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShitalprasad
PublisherManikchand Panachand Johari
Publication Year1925
Total Pages254
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size14 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy