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________________ 59 - निश्चयनय और व्यवहारनय व्यवहार कथन पारमार्थिक आशय अ. मनुष्य, देव, नारकी या तिर्यंच | मनुष्य, देव, नारकी, तिर्यंच आदि आदि जीव हैं। शरीरों के संयोग में रहनेवाली चेतन सत्ता ही जीव है। ब. आत्मा में ज्ञान-दर्शन-चारित्र आत्मा, ज्ञानादि अनन्त गुणों का | अखण्ड पिण्ड है। स. व्रत-शील-संयमादि मोक्षमार्ग व्रतादि के साथ रहनेवाला | वीतरागभाव मोक्षमार्ग है। .. ___ इसप्रकार जिनागम के हजारों व्यवहार कथनों का पारमार्थिक आशय ग्रहण करना चाहिए। कुछ प्रयोग निम्नानुसार हैं - व्यवहार कथन ____पारमार्थिक कथन 1. मैं व्यापार करता हूँ मैं व्यापार करने का राग करता हूँ, बाह्य क्रिया नहीं। --- 2. मैंने रात्रिभोजन का त्याग कर मुझे रात्रिभोजन - सम्बन्धी राग दिया। उत्पन्न नहीं होता। 3. भरत चक्रवर्ती ने छह खण्ड का भरत चक्रवर्ती ने षट्खण्ड की विभूति राज्य छोड़कर दीक्षा ली थी। | का राग छोड़कर दीक्षा ली थी। 4. ऋषभदेव मुनिराज ने चार | ऋषभदेव मुनिराज ने आत्मा में घातिया कर्मों का क्षय करके | विशेष लीनता द्वारा केवलज्ञान प्रगट केवलज्ञान प्रगट किया। किया। उस समय घातिया कर्मों का क्षय भी स्वयं हो गया। इसप्रकार जिनागम के सभी व्यवहार कथनों में कोई न कोई पारमार्थिक आशय अवश्य छिपा रहता है, अतः व्यवहारनय प्रतिपादक है और उसका यथार्थ आशय अर्थात् निश्चयनय प्रतिपाद्य है। .
SR No.007162
Book TitleNay Rahasya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAbhaykumar Jain
PublisherTodarmal Granthamala Jaipur
Publication Year2013
Total Pages430
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size30 MB
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