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उपसंहार एवं लाभ
उत्तर - अ = नहीं, गुरु = बड़ा, लघु = छोटा। अर्थात् प्रत्येक द्रव्य अपने में पूर्ण होता है, छोटा-बड़ा नहीं।
८४. प्रश्न - अगुरुलघुत्व गुण न मानने से क्या हानि होगी ?
उत्तर- अगुरुलघुत्व गुण न मानने से द्रव्य-गुण-पर्याय की स्वतंत्रता के नाश हो जाने का प्रसंग आयेगा।
८५. प्रश्न - अगुरुलघुत्व गुण को जानने से हमें क्या-क्या लाभ होते हैं ?
उत्तर - अगुरुलघुत्व गुण को जानने से हमें अमेक लाभ होते हैं, वे निम्नप्रकार हैं
१. विश्व का प्रत्येक द्रव्य, द्रव्य का प्रत्येक गुण और गुण की प्रत्येक पर्याय अपनी-अपनी अपेक्षा से सत्, अहेतुक एवं निरपेक्ष है; इस तरह वस्तु-व्यवस्था का स्पष्ट एवं पक्का निर्णय होता है।
२. प्रत्येक वस्तु का द्रव्य, क्षेत्र, काल एवं भाव भिन्न-भिन्न ही होने से एक वस्तु का अन्य वस्तु से किसी भी प्रकार का सम्बन्ध नहीं अर्थात् प्रत्येक द्रव्य स्वतंत्र ही है; ऐसा वस्तुस्वरूप का यथार्थ ज्ञान होता है।
३-४. एक द्रव्य अन्य द्रव्यरूप नहीं होता अर्थात् जीव द्रव्य पुद्गलादि अन्य द्रव्यरूप नहीं परिणमते; बदलते नहीं है। अथवा एक जीव द्रव्य दूसरे जीव द्रव्यरूप भी नहीं परिणमता। जीवद्रव्य, जीवद्रव्यरूप ही है और पुद्गलादि द्रव्य पुद्गलादि रूप ही रहते हैं। जैसे - शरीर (पुद्गल) कभी भी जीवरूप नहीं. बदलता। टी.वी., टेपरिकार्डर, रेडियो कभी भी जीव नहीं होते। लक्ष्मण का जीव राम के जीवरूप नहीं हो सका - ऐसा जानने से कर्ताबुद्धि का नाश होता है।
५. प्रत्येक गुण की पर्याय अर्थात् कार्य, भिन्न-भिन्न ही होने से एक ही द्रव्य में रहने वाले एक गुण की पर्याय, उसी द्रव्य में रहने वाले अन्य गुण की पर्याय से कथंचित् पूर्ण स्वतंत्र ही है; ऐसा निर्णय होता है।
६-७. श्रद्धा गुण की पर्याय क्षायिक सम्यक्त्वरूप (सिद्ध भगवान के सम्यक्त्व समान) पूर्ण निर्मल होने पर भी साधक जीव के ज्ञान और