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________________ दीपिका-नियुक्ति टीका अ.८ सू.३१ द्रव्यव्युत्सर्गतपो निरूपणम् ६९९ पतिमा आराधनाय गणस्य साधु समुदायस्य मनत्वत्यागो गणव्युत्सर्गतप उच्यते । एवम् वस्त्रादि रुपस्योपधेर्ममत्वत्यागरूपम् उपधिव्युत्सर्ग तप उच्यते । एवम् अशनादि त्यागरूपं भक्तपानव्युत्सर्गतप उच्यते ॥३१॥ तवार्थ नियुक्तिः-पूर्व तावत्-मायश्चित्तादि षष्ट्विधा भ्यन्तरतपःसु वैयावृत्यस्वाध्यायध्यानरूपाणि पञ्च तपांसि सविस्तर प्ररूपितानि, सम्पति-षष्ठ स्य व्युत्सर्गनामकाऽभ्यन्तरतपसः सविस्तर विशेष प्ररूपयितुमाह-'दयविउसग्ग तवे चउबिहे, सरीरविउसग्गाइभेषो-" इति । द्रध्यव्युत्सर्गतपःद्रव्यस्य शरीरवस्त्रादि व्युत्सर्गों विशेषग-उत्कृष्टभावनया सर्गों ममत्वत्यागः द्रव्यव्युत्सर्ग स्तद्रूपं तपो द्रव्यव्युत्सर्ग तपस्तावचतुर्विधं भवति, शरीरव्युत्सर्गा दिभेदतः। तथा च-शरीरव्युत्सर्ग तपः-१ आदिना-गणव्युत्सर्गतपः-२ उपधि व्युत्सर्ग तपः-३ भक्तपानव्युत्सर्गतपञ्च-४ त्येवं चतुर्विधं द्रव्यव्युत्सर्ग तपो इसी प्रकार द्वादश प्रतिमाओं की आराधना आदि के लिए गण अर्थात् साधु समुदाय का त्याग करना-एकाकी विचरना गणब्युस्सग है। वस्त्र आदि उपधि का त्याग कर देना उपधिव्युत्सर्ग है। इसी प्रकार अशनादि का त्याग करना भक्तपानव्युत्सगेतप कहलाता है ॥३१॥ तत्वार्थनियुक्ति-पहले छह प्रकार के आभ्यन्तर तपों में से वैयावृत्य, स्वाध्याय, ध्यान आदि पांच का विस्तारपूर्वक प्ररूपण किया जा चुका, अब छठे आभ्यन्तरतप व्युत्सर्ग का विस्तृत एवं विशेष रूपसे निरूपण किया जाता है विशेष रूप से, उस्कृष्ट भावना से, शरीर आदि द्रव्यों की ममता का त्याग करना द्रव्यत्युत्सर्ग ता कहलाता है। इस तप के चार भेद हैं(१) शरीरव्युत्सर्ग तप (२) गणव्युत्सर्ग तप (३) उपधिव्युत्सर्गतप (४) એવી જ રીતે બાર પડિમાની આરાધના આદિને માટે ગણુ અર્થાત્ સાધુ સમુદાયને ત્યાગ કર-એકલવિહારી વિચરવું ગણવ્યુત્સગ છે. વસ્ત્ર આદિ ઉપધિનો ત્યાગ કરી દે ઉપધિયુત્સર્ગ છે એવી જ રીતે અશન આદિને ત્યાગ કર ભક્તપાનબુત્સર્ગ તપ કહેવાય છે. એ ૩૧ તત્વાર્થનિર્યુક્તિ–પહેલા છ પ્રકારના આભ્યન્તર તપમાંથી વૈયાવૃત્ય સ્વાધ્યાય, ધ્યાન આદિ પાંચનું વિસ્તારપૂર્વક પ્રરૂપણ કરવામાં આવ્યું. હવે છઠા આધ્યારપ વ્યુત્સર્ગનું વિસ્તૃત તેમજ વિશેષ નિરૂપણ કરવામાં આવે છે. વિશેષરૂપથી ઉત્કૃષ્ટ ભાવનાથી શરીર આદિ દ્રવ્યની મમતાને ત્યાગ ४२. द्र०यव्युत्सगत५४३वाय छे. या तपना यार से छे-(१) शरी२०युत्स। त५ (२) व्युत्सत५ (3) ७५धियुत्सत५ मन (४) मतान०युत्स श्री तत्वार्थ सूत्र : २
SR No.006386
Book TitleTattvartha Sutra Part 02 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1973
Total Pages894
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, & Canon
File Size49 MB
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