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________________ श्री दशवेकालिकसूत्रे ॥ अथाष्टमाध्ययनम् ॥ वाक्यशुद्धाख्य सप्तमाध्ययनतो भाषणगुणदोषान् विज्ञाय निरवद्यभाषा भाषणीयेत्युपदिष्टम् । निरवद्यभाषा आचारपरिपालनानवहितस्य न भवतीत्यत आचारप्रणिधिनामकमष्टमाध्ययनं प्रस्तूयते - 'आयारप्पणिहि' इत्यादि । मूलम् - आयारेप्पणिहि लेख, जहाकायव्व भिक्खुणा ! १२० भे उदाहरिस्समि, आणुपुवि सुहं में ॥१॥ छाया - आचारप्रणिधिं लब्ध्वा यथाकर्तव्यं भिक्षुणा । तं भवद्भयः उदाहरिष्यामि, आनुपूर्व्या श्रृणुत मे ॥ १ ॥ टीका- ' आयार' इत्यादि । आचारप्रणिधिः=आचारे प्रवचनोक्तमर्यादानतिक्रमणपूर्व काचरणलक्षणे प्रणिधिः=प्रणिधानं सावधान तेत्यर्थः इत्याचारप्रणिधिस्तम्, यद्वा-प्रकृष्टो निधिः प्रणिधिः, आचारः प्रणिधिरिवेत्याचारप्रणिधिस्तं तथोक्तम् उत्कृष्टनिधिसदृशअथाष्टमाध्ययनम् वाक्य शुद्धिनामक सातवें अध्ययन में “ भाषा के गुणदोष जानकर निरवद्य भाषा बोलनी चाहिए. ऐसा उपदेश दिया है । किंतु जो आचार (संयम) का पालन करने में उपयोग नहीं रखता, उसकी भाषा शुद्धि नहीं होती, इसलिए, अब आचार प्रणिधि नामक आठवें अध्ययनका प्रतिपादन करते हैं- "आयारपणिहिं" इत्यादि । सुधर्मा स्वामी जम्बूस्वामी से कहते हैं - हे जम्बू ! शास्त्र में कही हुई मर्यादा का नाम आचार है, उसमें सावधान रहना आचारप्रणिधि है, अथवा - उत्तमनिधि निधान के समान आचारप्रणिधि વાકયદ્ધિ નામક સાતમા અધ્યયનમાં “ભાષાના ગુરુદેષ જાણીને નિરવદ્ય ભાષા એલવી જાઇએ” એવો ઉપદેશ આપ્યા છે કિંતુ જે आधार (संयम) नुं પાલન કરવામાં ઉપયેગ રાખતા નથી. એની ભાષા શુદ્ધિ થતી નથી, તેથી કરીને हवे आधार अशिधि नाम आठमा अध्ययननुं प्रतिपाहन उरे छे. आयारपणिहिं० छत्याहि, સુધર્માસ્વામી જંબૂને કહે છે કે-હે જખૂ! શાસ્ત્રમાં કહેલી મર્યાદાનું નામ આચાર છે, એમાં સાવધાન રહેવું એ આચારપ્રણિધિ છે; અથવા ઉત્તમ નિધિ શ્રી દશવૈકાલિક સૂત્રઃ ૨
SR No.006368
Book TitleAgam 29 Mool 02 Dasvaikalik Sutra Part 02 Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilal Maharaj
PublisherA B Shwetambar Sthanakwasi Jain Shastroddhar Samiti
Publication Year1960
Total Pages287
LanguageSanskrit, Hindi, Gujarati
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_dashvaikalik
File Size15 MB
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